
Mates in the battle for supremacy on the injured tiger
दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां हुआ करती थीं, मगर अब सिर्फ पांच प्रजातियां ही बची हैं। तीन प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। यह जानकारी मुय वन संरक्षक आर श्रीनिवास मूर्ति ने शनिवार को राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा आयोजित व्यायान माला में दी।
पर्यटन पर केंद्रित 'मध्य प्रदेश में बाघ संरक्षण का इतिहासÓ विषय पर आयोजित व्यायान माला में मूर्ति ने कहा कि बाघ को शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। बाघ वैश्विक विरासत है। दुर्लभ बाघ के संरक्षण और संवर्धन के लिए लोगों में जागरूकता जरूरी है।
उन्होंने ने बताया कि देश में वर्ष 1969 में बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाकर 1972 में वन्य-प्राणी संरक्षण अधिनियम के लागू होने से बाघ संरक्षण के काम को बल मिला। भारत सरकार की योजना में टाइगर रिजर्व कान्हा को बाघ संरक्षण के लिए सबसे पहले चुना गया था। देश में वर्तमान में लगभग 49 टाइगर रिजर्व हैं। इनमें से सात मध्य प्रदेश में हैं।
मूर्ति ने बाघ संरक्षण के लिए हुए प्रयासों का ब्योरा देते हुए कहा कि भारत में मुगल काल से लेकर अंग्रेजों के समय तक आखेट (शिकार) के लिए बाघों का संरक्षण किया जाता था। पर्यावरण की ²ष्टि से बाघ का वैज्ञानिक संवर्धन वर्ष 1963 के बाद ही शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।
उन्होंने कहा कि बाघों की मुय रूप से आठ प्रजातियां हैं, जिनमें से बंगाल (रायल बंगाल टाइगर), साइबेरियन, साउथ-चाइना, इंडो-चायनीज और सुमात्रा प्रजाति के बाघ अभी शेष हैं, जबकि बाली, जावा एवं एक अन्य प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।
मूर्ति ने कहा, ''दुनिया में 70 प्रतिशत बाघ भारत के हैं। देश में बाघ को राष्ट्रीय पशु के रूप में मान्यता प्राप्त है। बाघ को देखकर सभी को अच्छा अनुभव होता है। डरावना होते हुए भी बाघ दिलकश और जेन्टल होता है।
Published on:
27 Mar 2016 04:12 pm
