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जागा खालिस्तान का भूत, पंजाब में लगाए नारे

हमले के बाद आरोपी खालिस्तान समर्थित नारे लगाते हुए फरार हो गए। हमलावरों की संख्या करीब 60 बताई जा रही है।

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Rajeev sharma

May 18, 2016

चंडीगढ़। पंजाब का बंटवारा कर खालिस्तान के गठन की मांग काफी पुरानी है। लेकिन हाल ही में एक बार फिर इसका भूत जागा। मंगलवार को पंजाब के लुधियाना की साउथ सिटी के सुखमणि एन्क्लेव में संत बाबा रणजीत सिंह ढंडरियांवाले के काफिले पर हमला किया गया।

हमलावरों ने 50 से 60 राउंड फायर किए गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हमले के बाद आरोपी खालिस्तान समर्थित नारे लगाते हुए फरार हो गए। हमलावरों की संख्या करीब 60 बताई जा रही है।

इस हमले में चालक की सूझबूझ से संत रणजीतसिंह तो बच गए, लेकिन उनके साथ कार में सवार एक दूसरे संत बाबा भूपिंदर सिंह की मौत हो गई।

घटना के बाद लुधियाना में पुलिस ने हाई अलर्ट जारी कर दिया है। हमलावर शरबत पिलाने के बहाने स्टॉल लगाकर दोपहर से ही बाबा के काफिले का इंतजार कर रहे थे।

जानिए क्या है खालिस्तान समस्या

पंजाब की खालिस्तान समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों के रूप में हुई थी। 1973 और 1978 ई. में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया।

मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की तत्कालीन केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार दिए जाएं। वे कश्मीर की तरह पंजाब को भी धारा 370 सरीखी लगा कर स्वायत्तता देने की मांग कर रहे थे।

वे भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्वायत्तता चाहते थे उनकी मांग थी कि चंडीगढ़ केवल पंजाब की ही राजधानी हो, पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में शामिल किए जाएं। नदियों के पानी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की ही राय ली जाए, 'नहरों के हेडवक्र्सÓ और पन-बिजली बनाने के मूलभूत ढांचे का प्रबंधन पंजाब के पास हो।

सेना भर्ती काबिलियत के आधार पर हो और इसमें सिखों की भर्ती पर लगी कथित सीमा हटाई जाए तथा अखिल भारतीय गुरुद्वारा कानून बनाया जाए। इससे अकालियों का समर्थन और प्रभाव बढऩे लगा।

इसी बीच अमृतसर में 13 अप्रेल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए। रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

अनेक पर्यवेक्षक इस घटना को पंजाब में चरमपंथ की शुरुआत के रूप में देखते हैं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर सिख समुदाय में अकाली दल के जनाधार को घटाने के लिए जरनैल सिंह भिंडरांवाले को परोक्ष रूप से प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया जाता है।