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आदि शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर फहराई सनातन की ध्वजा: शाह

भक्ति, कर्म और ज्ञान, तीनों मार्गों से मोक्ष संभव है, यह समन्वित विचार आदि शंकराचार्य की देन, केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री शाह ने किया 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' की गुजराती भाषा में प्रकाशित आदि शंकराचार्य ग्रंथावली का विमोचन

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Amit Shah

Ahmedabad. केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित कर ज्ञानद्वीप की स्थापना की। पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में सनातन की ध्वजा फहराने का कार्य किया।

वे गुरुवार को शहर के टैगोर हॉल में 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' द्वारा गुजराती भाषा में प्रकाशित आदि शंकराचार्य की ग्रंथावली के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

शाह ने कहा कि इन चारों मठों के तत्वावधान में सारे वेदों और उपनिषदों को बांटकर उनके संरक्षण और संवर्धन के लिए एक व्यवस्था भी आदि शंकराचार्य ने स्थापित की। कठिन से कठिन परिस्थितियों में सनातन धर्म कालबाह्य न हो, इसके लिए उन्होंने अखाड़ों की स्थापना की। सनातन संस्कृति के लिए संगठन का निर्माण किया।

उन्होंने कहा कि भक्ति, कर्म और ज्ञान, तीनों मार्गों से मोक्ष संभव है, यह समन्वित विचार आदि शंकराचार्य की महान देन है। संस्कृत में रचित आदि शंकराचार्य की ग्रंथावली को गुजराती भाषा में प्रकाशित कर गुजरात के युवाओं के लिए उपलब्ध कराया है। यह बहुत बड़ा खजाना है।शाह ने कहा कि 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र सहित अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों को गुजराती भाषा में उपलब्ध कराया है। गुजरात के सामूहिक चरित्र निर्माण में स्वामी अखंडानंद का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

शाह ने कहा कि इस सृष्टि पर अब तक जितना ज्ञान उपलब्ध है, उसमें “शिवोऽहम्” से बढ़कर कुछ नहीं है। इतनी सरल, सटीक और सत्य के निकट उपनिषदों की व्याख्या और कोई नहीं दे सकता, यह कार्य केवल आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे।ढेर सारी कुरीतियां आने के कारण सनातन धर्म को लेकर कई आशंकाएं उत्पन्न हो गईं थीं। आदि शंकराचार्य के ग्रंथों को क्रमबद्ध रूप से पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में ही सारी आशंकाओं का निराकरण कर दिया और सभी किंतु-परंतु के तर्कबद्ध उत्तर उपलब्ध कराए।

मोक्ष तक पहुंचने का मार्ग भी बताया

शाह ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने सिर्फ मोक्ष का विचार नहीं दिया, बल्कि मोक्ष तक पहुंचने का मार्ग भी बताया। उन्होंने एक प्रकार से उस जमाने में पैदल चलते विश्वविद्यालय की भूमिका निभाई। सिर्फ पैदल यात्रा ही नहीं की, बल्कि भारत की पहचान को प्रस्तुत किया। उन्होंने शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित कर संवाद से समाधान और कल्चर ऑफ डिबेटिंग की नींव रखी। उन्होंने प्रकृति की पूजा से लेकर सनातन के मूल तत्व को पहचानने का रास्ता आम लोगों के लिए प्रशस्त किया।

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