अहमदाबाद

Chello Show: छेल्लो शो हर वर्ग के लिए देखने जैसी फिल्म: : फिल्म निर्देशक नलिन

Film 'Chhelo Show', Director Pal Nalin, Oscar, Gujarat

3 min read
Chello Show: छेल्लो शो हर वर्ग के लिए देखने जैसी फिल्म: : फिल्म निर्देशक नलिन

Film 'Chhelo Show' is a must watch film for every class:Director Nalin

भारत की ओर से श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म संवर्ग में इस बार ऑस्कर पुरस्कार के लिए गुजराती फिल्म ‘छेल्लो शो’ (लास्ट शो) को भेजा गया है। इस फिल्म के निर्देशक पान नलिन (नलिन कुमार पंड्या) गुजरात के अमरेली जिले के हैं जिन्होंने कई फीचर फिल्में, शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। उनकी कई फिल्मों ने पुरस्कार प्राप्त किया है जिनमें समसारा, वैली ऑफ फ्लावर्स और एंग्री इंडियन गॉडेसेस शामिल हैं। पत्रिका संवाददाता उदय पटेल ने फिल्म के निर्देशक नलिन से बातचीत की। पेश है इस बातचीत के कुछ अंश।
---------------

सवाल: इस फिल्म का बैक ग्राउंड क्या है और इसे किस तरह से पर्दे पर उतारा गया?

जवाब: 2010 और 2011 के समय में सिनेमा में एक बदलाव आया। इससे पहले थिएटर में 35 मिलीमीटर सैल्युलाइड का सिस्टम था। तब प्रिंट गांव-गांव तक जाता था। वह जमाना प्रोजेक्टर का था। लेकिन 10 वर्ष पहले ये सारे प्रोजेक्टर डिजीटल हो गए। इसके बाद बहुत सारे बदलाव आ गए। नए स्टाइल के ऑपरेटर आ गए। इस कारण प्रोजेक्टर से जुड़े एक से दो लाख लोग बेरोजगार हो गए।
डिजीटल प्रोजेक्टर होने के कारण कंप्यूटर और अंग्रेजी का भी ज्ञान जरूरी था। साथ में इसमें कई तरह की सीमाएं भी थीं। नए प्रकार के ऑपरेशन आ गए। जब मैं 9 या 10 वर्ष का था तब मैंने पहली बार फिल्म देखी। प्रोजेक्टर दिखाने वाले को मैं लंच बॉक्स देता था जिसके बदले में वह मुझे फिल्में देखने देता था।
2007 में मैंने पहली फीचर फिल्म समसारा शूट की थी जो सैलुलाइड में थी। लेकिन तब लगा कि यह कहानी लोगों को कहनी चाहिए। सिनेमा हॉल के भीतर एक अलग टाइप का ही जीवन और माहौल था। इस फिल्म में बालपन, भोलेपन की बातें हैं जिसकी एक अलग ही दुनिया होती है। फिल्म की दुनिया का वास्तविक जीवन से कोई कनेक्शन ही नहीं होता है। इस फिल्म की यही पृष्ठभूमि है। यह फिल्म कोई भी वर्ग देख सकता है।भले ही वह व्यक्ति फिल्म से जुड़ा हो या नहीं। सिनेमा और सिनेमा के सपने की स्टोरी यह है फिल्म।

सवाल: भारत की ओर से आपकी फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजा जाना कितनी बड़ी बात है?

जवाब: यह बहुत ही ज्यादा गर्व की बात है। मेरे लिए और खासकर फिल्म के युवा कलाकारों के लिए यह बहुत बड़ा क्षण है। मैंने वास्तविक फिल्म बनाई है। इसमें अधिकांश कलाकार गुजरात के और युवा हैं। इनमें से ज्यादातार 30 वर्ष से कम उम्र के हैं। बगसरा, अमरेली, लाठी, कच्छ के लोगों ने इस फिल्म को बनाया है।

सवाल: फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजे जाने से गुजराती सिनेमा को कितना फायदा पहुंचेगा?

जवाब: इससे गुजराती ही नहीं बल्कि सभी क्षेत्रीय सिनेमा को फायदा पहुंचेगा। पहले भी क्षेत्रीय फिल्में ऑस्कर के लिए भारत की ओर से भेजी जाती रही हैं। बेहतर फिल्में बनाने को लेकर और अच्छी प्रतिस्पर्धा होंगी।

सवाल: ऑस्कर जीतने को लेकर कितने आशास्पद हैं आप?

जवाब: कहना बहुत मुश्किल है। ऑस्कर में विदेशी भाषा फिल्मों की कैटगरी में दुनिया भर से करीब 100 से 130 फिल्में होती हैं। इनमें 15 फिल्में शॉर्ट लिस्ट होती हैं। इसके बाद पांच फिल्मों को नॉमिनेशन मिलता है। नॉमिनेशन मिलना भी बहुत बड़ी बात होती है। यह जूरी पर निर्भर होता है कि वे कौन सी और किस तरह की फिल्म को पसंद करते हैं।

अब तक 3 भारतीय फिल्मों को मिल चुका नामांकन

-इनमें ‘मदर इंडिया’, ‘सलाम बॉम्बे’ व ‘लगान’ शामिल

भारत ऑस्कर पुरस्कारों के लिए वर्ष 1957 से फिल्में भेज रहा है। 30वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए उसी वर्ष भेजी गई फिल्म मदर इंडिया को नामांकन (नॉमिनेशन) मिला था।
इसके बाद 1988 में 61वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए भारत की ओर से मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ भेजी गई थी। भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कारों में अंतिम बार नामांकित की गई फिल्म लगान थी। इसे वर्ष 2001 में 74वें पुरस्कार के लिए भारत की ओर से ऑफिशियल एंट्री के रूप में भेजा गया था।

Published on:
24 Oct 2022 12:00 am
Also Read
View All

अगली खबर