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11 मिस्त्रियों के भरोसे 69 बसें

पांच साल से मैकेनिक को तरस रहा धौलपुर रोडवेज डिपो करोड़ों रुपए का राजस्व देने वाला रोडवेज का धौलपुर डिपो मैकेनिकों की कमी से जूझ रहा है। स्थिति यह है कि विगत पांच वर्षों से वर्कशॉप में स्वीकृत 41 पदों में मात्र 11 मिस्त्री ही कार्यरत हैं। इनमें मिस्त्री अवकाश पर रहते है। ऐसे में स्वीकृत पदों के एक चौथाई मिस्त्रियों के भरोसे ही डिपो में उपलब्ध 69 बसों की मरम्मत का कार्य किया जा रहा है। इससे रोडवेज को राजस्व का नुकसान भी हो रहा है।

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अजमेर

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Dilip Sharma

Sep 15, 2020

11 मिस्त्रियों के भरोसे 69  बसें

11 मिस्त्रियों के भरोसे 69 बसें

-पांच साल से मैकेनिक को तरस रहा धौलपुर रोडवेज डिपो
धौलपुर. करोड़ों रुपए का राजस्व देने वाला रोडवेज का धौलपुर डिपो मैकेनिकों की कमी से जूझ रहा है। स्थिति यह है कि विगत पांच वर्षों से वर्कशॉप में स्वीकृत ४९ पदों में मात्र ११ मिस्त्री ही कार्यरत हैं। इनमें मिस्त्री अवकाश पर रहते है। ऐसे में स्वीकृत पदों के एक चौथाई मिस्त्रियों के भरोसे ही डिपो में उपलब्ध ६९ बसों की मरम्मत का कार्य किया जा रहा है। इससे रोडवेज को राजस्व का नुकसान भी हो रहा है।

स्थानीय अधिकारियों द्वारा कई बार निगम के उच्च अधिकारियों को अवगत कराने के बाद भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जबकि कुछ समय पूर्व ही मैकैनिक पदों पर भर्ती की गई थी, लेकिन इन नव पदस्थापित मैकेनिकों में से स्थानीय डिपो को एक भी मैकेनिक उपलब्ध नहीं कराया गया।
मरम्मत कार्य में होती है देरी

धौलपुर जिले के अधिकांश सडक़ मार्ग क्षतिग्रस्त होने के कारण रोज बसों में टूट-फूट होती है। वहीं हर बस को डिपो में ट्रिप पूरी होने के बाद जांचा जाता है। ऐसे में मिस्त्रियों का टोटा झेल रहे डिपों में कई दिन तक बसें मरम्मत के लिए खड़ी रहती है।

इनका कहना है

पांच वर्ष से मिस्त्रियों की कमी चल रही है। वर्तमान में ४९ स्वीकृत पदों में से ११ मिस्त्री ही कार्यरत हैं। ऐसे में बसों की मरम्मत कार्य में देरी होती है और कई दिन तक वर्कशॉप में खड़ी रहती है। इस कारण शिड्यूल निरस्त करने पड़ते हैं। जिससे राजस्व का नुकसान होता है। साथ ही यात्रियों को परेशानी होती है।
पुनीत कुमार द्विवेदी, प्रबंधक यातायात, धौलपुर डिपो।

एक मिस्त्री पर छह बसों का भार

वर्कशॉप में क्षतिग्रस्त व खटारा बसों के मरम्मत का कार्य किया जाता है। वहीं हर बस की हवा-पानी की जांच करनी होती है। लेकिन मिस्त्रियों के अभाव में एक-एक मिस्त्री पर औसतन छह बसों का भार रहता है। इससे समय पर कार्य पूरा नहीं हो पाता है।
शिड्यूल करने पड़ते हैं निरस्त

बसों के समय पर सही नहीं होने के कारण कई बार बसों के शिड्यूल निरस्त करने पड़ते हंै। जिससे डिपो को राजस्व का नुकसान होता है। वहीं चालक व परिचालक भी डिपो में बिना कार्य बैठे रहते हैं। दूसरी ओर यात्रियों को भी समय पर पर्याप्त बसें नहीं मिल पाती है और उन्हें बसों में अधिक भीड़ में धक्के खाते हुए यात्रा करनी पड़ती है।
राजस्व में भी आगे

डिपो में औसत रोज छह से सात लाख रुपए की आय है। इस हिसाब से वर्ष भर में करीब २२ करोड़ रुपए की आय है। इसके बावजूद मिस्त्री उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।