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सत्यकथा : कभी गडरिया तो कभी चरवाहा बनकर 7 दिन की जंगल में घेराबंदी के बाद दबोचा

अजमेर के पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप बता रहे हैं जून-2019 में ब्यावर सिटी थाने में दर्ज सात साल की मासूम बालिका से बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार करने की सत्यकथा...।
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अजमेर

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Dilip Sharma

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Updated: 13 Oct 2020, 1:06 AM IST

सत्यकथा : कभी गडरिया तो कभी चरवाहा बनकर 7 दिन की जंगल में घेराबंदी के बाद दबोचा

सत्यकथा : कभी गडरिया तो कभी चरवाहा बनकर 7 दिन की जंगल में घेराबंदी के बाद दबोचा

अजमेर के पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप बता रहे हैं जून-2019 में ब्यावर सिटी थाने में दर्ज सात साल की मासूम बालिका से बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार करने की सत्यकथा...।

कुंवर राष्ट्रदीप सिंह

पुलिस अधीक्षक, अजमेर

आरोपी ने मासूम को दरिंदगी का शिकार बनाने के बाद जंगल में छोड़ दिया। वो जब पुलिस और परिवार को मिली तो दशा बहुत ही चिंताजनक थी। इस पर ना आरोपी की पहचान... ना कोई सुराग। आरोपी को पकडऩा अंधेरे में तीर चलाने जैसा था।

अजमेर. करीब सवा साल पहले की घटना...सात साल की मासूम के साथ दरिन्‍दगी...और उसे जंगल में ले जाकर छोडऩा। एक तरफ बारिश का मौसम और वारदात को लेकर लोगों का आक्रोश। ऐसे में भीम-टॉडगढ़ के घने जंगल और ऊंची-नीची दुर्गम पहाडिय़ां में बलात्‍कारी की तलाश की बड़ी चुनौती। आखिर पुलिस के 70 जवान ग्रामीणों के भेष में कभी गडरिया तो कभी चरवाहा और किसान बनकर अनगिनत अवरोधों का पार करते हुए सात रोज में दिन-रात एक करने के बाद आरोपी तक पहुंच ही गए। यह कोशिश थी करीब सवा साल पहले सात साल की मासूम से बलात्कार करने के आरोपी की गिरफ्तारी की।

...मां के पास सो रही बालिका को आरोपी 13 जून की रात उठा ले गया। आरोपी ने मासूम को दरिंदगी का शिकार बनाने के बाद जंगल में छोड़ दिया। वो जब पुलिस और परिवार को मिली तो दशा बहुत ही चिंताजनक थी। इस पर ना आरोपी की पहचान... ना कोई सुराग। आरोपी को पकडऩा अंधेरे में तीर चलाने जैसा था। पुलिस के लिए यह केस चुनौती की तरह था। शुरुआती चौबीस घंटे की कोशिश ज्यादा उत्साहजनक नहीं थी। तमाम प्रयास के बाद पुलिस को चंद सैकंड के सीसीटीवी फुटेज मिले। इन्‍हीं में से सुराग तलाश करना था। आखिर कड़ी मशक्‍कत के बाद पुलिस को दिशा मिली तो आरोपी राजसमन्द निवासी महेन्द्र सिंह घर और गांव छोडक़र निकल गया। उसने फरारी के लिए जंगल चुना। जाना पहचाना एरिया होने से उसके लिए बहुत मुफीद था। स्थानीय व दूर बैठे उसके साथी महेन्द्र की मोबाइल पर मदद कर रहे थे। उस हर गतिविधि से अवगत करवा रहे थे। वक्त बीता तो पुलिस के लिए उसकी गिरफ्तारी चुनौती लगने लगी।

जंगल के आस-पास ढाबों पर डेरा

जैसे ही पुलिस को सुराग मिला सबसे पहले महेन्‍द्र को अहमदाबाद से मोबाइल फोन पर दिशा-निर्देश दे रहे साथी को पकड़ा। उसे अंदाजा ही नहीं था कि पुलिस उस तक आसानी से पहुंच जाएगी। उसे अहमदाबाद से ब्यावर लाने के बाद भीम-टाटगढ़ के जंगल में सर्च अभियान शुरू हुआ। पुलिस के 70 जवान 5 रोज तक रात-दिन तक भीम-टॉडगढ़ के निकट डेरा डाले रहे। जवान रात में हाईवे के ढाबों पर ग्रामीणों के भेष में ठहरते और दिनभर आरोपी की तलाश में जंगल की खाक छानते।

पहले मददगार... फिर आरोपी गिरफ्तार


आरोपी महेन्द्र क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से परिचित था। उसे बारिश में घने जंगल में ढूंढना चुनौतीपूर्ण था। महेन्द्र दिन में ऊंची पहाड़ी पर जा बैठता। ताकि हर गतिविधि पर दूर तक उसकी नजर रहे। वहीं रात में वह जंगल में किसी सुरक्षित ठिकाने पर चला जाता। पुलिस ने किसी तरह उसे शरण व मदद देने वालों की पहचान की। पुलिस ने उसके साथी कुशाल सिंह, हरिसिंह, पुष्पेन्द्र सिंह उर्फ भागू व गजेन्द्र सिंह रावत को गिरफ्तार किया। मददगारों की गिरफ्तारी के बाद मुख्य आरोपी महेन्द्र का नेटवर्क टूट गया। सीओ ब्यावर हीरालाल सैनी, थानाप्रभारी ब्यावर सिटी रमेन्द्रसिंह हाड़ा, जिला स्पेशल व साइक्लोन टीम ने ‘रियल फील्ड वर्क’ का उदाहरण पेश करते हुए 19 जून को उसे दबोच लिया।

आमजन ने रखा संयम, दिखाया विश्वास

वारदात को लेकर लोगों में गुस्सा था। कानून व्यवस्था बिगडऩे के हालात बन चुके थे। लेकिन आमजन ने पुलिस के काम और कोशिश पर भरोसा करते हुए संयम रखा। इसके चलते पुलिस आरोपी महेन्द्र को दबोचने में कामयाब रही। नहीं तो अक्सर किसी घटना के बाद बिगडऩे वाली कानून व्यवस्था पुलिस अनुसंधान को प्रभावित करती है। जब आपको यह पता हो कि सात साल की मासूम से दरिंदगी हुई है तो दबाव के साथ जिम्मेदारी भी होती है और सरोकार भी। लेकिन विपरीत हालात में भी साथियों पर भरोसा और टीम वर्क परिणाम जनित होता है