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जब ‘नंददुलारे’ ने दिखाया अदम्य साहस, वीरचक्र से हुए सम्मानित

1971 के भारत-पाक युद्ध में कुशल नेतृत्व का दिया परिचय, रोड ब्लॉक लगाकर दुश्मन सेना की टुकड़ी के लौटने के रास्ते बंद कर उसे आत्मसमर्पण को किया मजबूर

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अजमेर

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dinesh sharma

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दिनेश कुमार शर्मा

Mar 20, 2026

1971 war

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल नंद दुलारे माथुर

दिनेश कुमार शर्मा

अजमेर (Ajmer news). देशभक्ति का जज्बा जब रगों में दौड़ता है तो हर चुनौती छोटी लगने लगती है। वर्ष 1971 युद्ध के दौरान मां भारती के सपूत नंददुलारे माथुर ने अपने अदम्य साहस और कुशल नेतृत्व के जरिए ऐसी ही चुनौती का सामना किया। उन्होंने रोड ब्लॉक लगाकर दुश्मन सेना की टुकड़ी के लौटने के रास्ते बंद कर उसे आत्मसमर्पण को मजबूर कर दिया। वीरता की मिसाल नंददुलारे को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

सेना में जाने का सपना

वैशालीनगर साकेत कॉलोनी निवासी रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल नंद दुलारे माथुर की प्रारंभिक शिक्षा अग्रवाल स्कूल से हुई। इसके बाद राजकीय महाविद्यालय अजमेर से प्री-यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही सेना में जाने का सपना संजोए माथुर ने एनसीसी के जरिए लक्ष्य को दिशा दी। जनवरी 1963 में उनका चयन नेशनल डिफेंस एकेडमी में हुआ। तीन वर्ष एनडीए और एक वर्ष आईएमए देहरादून में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद दिसम्बर 1966 में वे 22वीं बटालियन राजपूत रेजिमेंट में सैकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशंड हुए।

मोर्चा संभालते हुए रोड ब्लॉक स्थापित किया

वे हैदराबाद, अगरतला और गया सहित कई महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात रहे। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में वे मेजर के रूप में डेल्टा कंपनी के कमांडर थे। उनकी बटालियन पूर्वी पाकिस्तान में तैनात थी। 15 दिसम्बर को उन्हें दुश्मन के पीछे जाकर रोड ब्लॉक स्थापित करने का दायित्व मिला। दुश्मन की भीषण मोर्टार और मशीनगन फायरिंग के बीच उन्होंने साथियों के साथ मोर्चा संभालते हुए रोड ब्लॉक स्थापित किया।

बड़ी मात्रा में हथियार और रसद भी जब्त की

दिनभर चली भीषण मुठभेड़ में दुश्मन ने कई बार हमला कर रोड ब्लॉक तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। शाम को दुश्मन ने भारी हथियारों के साथ हमला बोला, लेकिन भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और रणनीति के आगे वह टिक नहीं सका। अंततः दुश्मन के 14 अधिकारी, 9 जेसीओ और 330 सैनिकों ने समर्पण कर दिया। इस कार्रवाई में बड़ी मात्रा में हथियार और रसद भी जब्त की गई।

तीनों सेनाओं के प्रमुख भी मौजूद

उनकी वीरता, साहस और कुशल नेतृत्व के लिए अक्टूबर 1972 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित अलंकरण समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति वी. वी. गिरी ने उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया। इस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तीनों सेनाओं के प्रमुख भी मौजूद थे। इसके बाद उन्होंने शाहजहांपुर, सिक्किम, तेजपुर, ग्वालियर, कश्मीर, इलाहाबाद, अमृतसर, बीकानेर और जोधपुर सहित कई स्थानों पर सेवाएं दीं और अक्टूबर 1996 में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

उनके पिता दिवंगत सी.एल. माथुर प्रख्यात पत्रकार रहे। माता कमला देवी, पत्नी मंजू देवी गृहिणी हैं। उनके पुत्र प्रशांत माथुर निजी अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ, जबकि पुत्री डॉ. पूजा माथुर जेएलएन मेडिकल कॉलेज में चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रही हैं।

दिल्ली से आवास पर पहुंची स्वर्णिम विजय मशाल

सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध के 50 साल पूर्ण होने पर स्वर्णिम विजय मशाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश के बाद दिल्ली के विजय स्तंभ से रवाना की गईं। पाक से युद्ध की बरसी पर दिल्ली से चार मशाल देश की चारों दिशाओं में रवाना की गईं। इनमें से एक मशाल रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल माथुर के साकेत कॉलोनी स्थित आवास पर लाई गई। यह माथुर को सौंपकर उन्हें सम्मानित किया गया। इस दौरान उनके आंगन से मिट्टी को कलश में भरकर दिल्ली ले जाया गया।