विधानसभा में कांग्रेस को अपना मत प्रतिशत बढ़ाने की चिंता सता रही है। कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व भाजपा के बीच एक करीब फीसदी से कम मत का अंतर रहा था। अलवर जिले में कांग्रेस का कोई प्रत्याशी 50 फीसदी मतों के आंकड़े को नहीं छू पाया था। इस बार विधायकों के प्रति नाराजगी है, इस कारण कांग्रेस के लिए अपना वोट बढ़ाना मुश्किल हो रहा है।
अलवर. प्रदेश में फिर से सरकार रिपिट करने की तैयारी में जुटी कांग्रेस के लिए इस बार अलवर जिले में अपने मत प्रतिशत बढ़ाना जरूरी होगा। कारण है कि गत विधानसभा चुनाव में जिले में कांग्रेस व भाजपा के बीच मतों में एक फीसदी से कम का अंतर रह पाया था, हालांकि मतों में कम अंतर के बाद भी कांग्रेस पांच सीटें जीतने में कामयाब रही, वहीं भाजपा को दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। लेकिन इस बार राजनीतिक िस्थतियां बदली हैं, ऐसे में कांग्रेस ने अपने मतों का आंकड़ा नहीं बढ़ाया तो पुराना परिणाम दोहराना मुश्किल हो सकता है।
विधानसभा चुनाव 2018 में अलवर जिले के 11 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को 32.53 फीसदी वोट मिला, वहीं भाजपा को 31.90 प्रतिशत मत मिले। यानी कांग्रेस व भाजपा के बीच 0.63 फीसदी का अंतर रहा। लेकिन इस कम अंतर ने अलवर जिले में राजनीतिक तस्वीर बदल दी। पिछले चुनाव में कांग्रेस को जिले में 5 सीटें मिली, वहीं दो भाजपा, दो बसपा एवं दो निर्दलीय प्रत्याशी जीते। बाद में बसपा से चुने गए दोनों विधायकों ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया और निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस के सहयोग में आ गए। यानी मात्र आधा फीसदी से कुछ ज्यादा वोट प्रतिशत ने कांग्रेस को शिखर पर पहुंचा दिया, वहीं भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी।
इस बार बदली राजनीतिक िस्थति
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार अलवर की 11 सीटों पर राजनीतिक िस्थतियां पिछले चुनाव से बदली हैं। पांच साल सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस विधायकों के समक्ष एंटी इंकम्बेंसी की समस्या बड़ी है। ऐसे में कांग्रेस को पुराना चुनाव परिणाम दोहराना आसान नहीं होगा। पार्टी के लिए इस विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ाने की जरूरत होगी, लेकिन कांग्रेस के लिए यही बड़ी चुनौती है।