
अलवर से एक कविता रोज: रिश्तों की अहमियत, लेखिका- अनुराधा तिवाडी
रिश्तो की अहमियत
चांद तारों की छांव में,
सब खाट बिछा कर सोते थे |
ना चोरी का डर था
ना कत्ल के किस्से होते थे||
भले ही उस किसान ने
दो रोटी में दिन गुजारा था|
पर उसे बेईमानी की विलासिता से ज्यादा,
अपना स्वाभिमान प्यारा था|
साझे में रहते थे सब ,
संपत्ति के लिए धरती मां के बंटवारे के किस्से ना थे|
तब एक घर के कई कई हिस्से ना थे||
अपने अौदे का ना किसी को अभिमान था|
बस परिवार के हर सदस्य में
प्यार और सम्मान था||
गाड़ी बंगले खरीदने जैसा
ना कोई अमीर था |
पर अपनों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने का हर शख्स में जमीर था||
इतना खूबसूरत जहां का नजारा था|
ऐसा प्यारा देश हमारा था ||
पर प्रकृति में जब बदलाव आया|
पैसे की कीमत समझी सब ने पर अनमोल रिश्तो की अहमियत कोई ना समझ पाया||
पहले होते तो परिवारों में दोस्ती के किस्से|
अब होते हैं भाइयों में दुश्मनी के रिश्ते||
अब हर कोई अपने परिवार के रिश्तों से आजादी चाहता है
और गैरों में अपनापन ढूंढ कर नए नए स्वार्थी रिश्ते बनाता है|
अब जा रहे हैं हम अपनी इंसानियत खोते|
किस कदर छोड़ देते हैं अपने मां-बाप को रोते||
आसमान में बैठे फरिश्ते न होते,
अगर धरती पर जुल्मों सितम के किस्से ना होते|
अनुराधा तिवाडी
43 नेहरू नगर NEB, अलवर
Published on:
07 Sept 2020 07:16 pm

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