नौतपा भारतीय मौसम और पारंपरिक ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़ा एक विशेष कालखंड है। ‘नौतपा’ का अर्थ है ‘नौ दिनों की तीव्र तपिश’। ज्येष्ठ मास में जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब नौतपा आरंभ होता है। इस वर्ष यह 25 मई से 2 जून तक चलेगा। मान्यता है कि इन दिनों सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अधिक सीधी और तीव्रता से पड़ती हैं, जिससे तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है।
योगेश कुमार गोयल, पर्यावरण विषयों के जानकार
इस समय मानो पूरा देश आग की भट्टी में तब्दील हो चुका है। उत्तर भारत से लेकर पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत तक गर्म हवाओं के थपेड़ों ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में तापमान लगातार 44-46 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है। भारत मौसम विज्ञान विभाग पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि जून के प्रथम सप्ताह तक राहत की संभावना अत्यंत कम है। ‘नौतपा’ इस संकट को और भयावह बना सकता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार दिल्ली में पिछले लगभग 15 वर्षों का सबसे गर्म नौतपा दर्ज किया जा सकता है।
बरसती आग मौसम की सामान्य घटना नहीं
आसमान से बरसती आग केवल मौसम की सामान्य घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह बदलती जलवायु, प्रकृति के साथ बढ़ते मानवीय खिलवाड़ और पृथ्वी के बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन की भयावह चेतावनी बन चुकी है। जिस प्रकार इस वर्ष मई में गर्मी ने पुराने रेकॉर्ड तोड़ दिए हैं, उसने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इस बार पश्चिमी विक्षोभों की सक्रियता बेहद कम रही है। सामान्यत: मई-जून में पश्चिमी विक्षोभों के कारण कहीं न कहीं आंधी, बारिश अथवा बादल छाने से तापमान में अस्थायी राहत मिल जाती है, लेकिन इस वर्ष ऐसा नहीं हो पाया। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भी अभी तक कोई प्रभावी उष्णकटिबंधीय चक्रवात विकसित नहीं हुआ, जिसके कारण वातावरण में नमी और ठंडी हवाओं का प्रवेश नहीं हो सका। परिणामस्वरूप धरती लगातार तपती चली गई।
नौतपा’ यानी नौ दिनों की तीव्र तपिश
जहां तक नौतपा की बात है, तो यह भारतीय मौसम और पारंपरिक ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़ा एक विशेष कालखंड है। ‘नौतपा’ का अर्थ है ‘नौ दिनों की तीव्र तपिश’। ज्येष्ठ मास में जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब नौतपा आरंभ होता है। इस वर्ष यह 25 मई से 2 जून तक चलेगा। मान्यता है कि इन दिनों सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अधिक सीधी और तीव्रता से पड़ती हैं, जिससे तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है। भारतीय जनमानस में नौतपा को सदियों से भीषण गर्मी के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार नौतपा के दौरान तापमान सामान्य से कहीं अधिक रह सकता है। स्काईमेट वेदर के पूर्वानुमान के अनुसार, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जून के पहले सप्ताह तक लू का दौर जारी रहेगा। दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में दिन का तापमान 46 डिग्री तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों में कोई प्रभावी पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
भारतीय कृषि और मानसून चक्र में नौतपा का विशेष महत्त्व
नौतपा को हालांकि इंसानों के लिए कष्टकारी माना जाता है, लेकिन भारतीय कृषि और मानसून चक्र में इसका विशेष महत्त्व माना गया है। परंपरागत मान्यता है कि जितनी अधिक गर्मी नौतपा में पड़ती है, उतना ही बेहतर मानसून होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यधिक गर्मी समुद्री सतह के तापमान को बढ़ाती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज होती है और बादलों के निर्माण में सहायता मिलती है। यही बादल आगे चलकर मानसून वर्षा का आधार बनते हैं। खरीफ फसलों की सफलता काफी हद तक इस प्राकृतिक चक्र पर निर्भर करती है। लेकिन आज की परिस्थिति केवल प्राकृतिक चक्र की सामान्य गर्मी नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का खतरनाक संकेत बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के पूर्व स्तर की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में विश्व के लगभग सभी सबसे गर्म वर्ष दर्ज किए गए हैं। वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव पहले से कहीं अधिक लंबी, तीव्र और घातक होती जाएंगी।
भीषण गर्मी का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर
भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। अमेरिकी संस्था ‘बर्कले अर्थ’ के अध्ययन के अनुसार, भारत का औसत तापमान लगभग एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं के मुताबिक, जिस प्रकार की भीषण गर्मी पहले 50 वर्षों में एक बार महसूस की जाती थी, अब वह हर कुछ वर्षों में सामान्य घटना बनती जा रही है। इस भीषण गर्मी का सबसे बड़ा प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। हीटवेव के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, उल्टी, सिरदर्द और मांसपेशियों में ऐंठन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अत्यधिक तापमान के कारण शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और कई बार स्थिति जानलेवा बन जाती है। अस्पतालों में गर्मी से प्रभावित मरीजों की संख्या बढ़ रही है। वृद्ध, बच्चे, श्रमिक और पहले से बीमार लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। जब शरीर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है, तब उष्माघात की स्थिति उत्पन्न होती है, जो घातक सिद्ध हो सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को दोपहर में घर से बाहर न निकलने, पर्याप्त पानी पीने तथा धूप से बचाव करने की सलाह दे रहे हैं।
बढ़ते तापमान और प्रदूषण का सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर
भीषण गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। देश में बिजली की मांग रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। एयर कंडीशनर और कूलर के बढ़ते उपयोग से बिजली ग्रिडों पर भारी दबाव पड़ रहा है। कई राज्यों में जलस्रोत सूखने लगे हैं और पेयजल संकट गहराने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और अधिक गंभीर है, जहां पानी के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। कृषि क्षेत्र भी इस तापीय संकट से प्रभावित हो रहा है। अत्यधिक गर्मी गेहूं सहित कई फसलों की पैदावार घटा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान और प्रदूषण का सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन भविष्य में खाद्य संकट, जल संकट और आर्थिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। इस संकट की जड़ में मानवीय गतिविधियां ही हैं। औद्योगिकीकरण, वाहनों का अत्यधिक उपयोग, जीवाश्म ईंधनों का दहन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को गहरा आघात पहुंचाया है। वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। पेड़-पौधे, जो कभी पृथ्वी के प्राकृतिक ताप नियंत्रक थे, तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं।
बिगड़ रहा है प्रकृति का संतुलन
जनसंख्या वृद्धि ने भी इस संकट को कई गुना बढ़ाया है। बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन किया जा रहा है। पहाड़ों को काटकर सडक़ें और इमारतें बनाई जा रही हैं, नदियों को प्रदूषित किया जा रहा है और जंगलों को कंक्रीट में बदला जा रहा है। परिणामस्वरूप प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है और मौसम का मिजाज अप्रत्याशित होता जा रहा है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में देखें, तो आज कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं अचानक बाढ़ आ रही है, कहीं भीषण गर्मी है तो कहीं असामान्य वर्षा। कभी ओलावृष्टि किसानों की मेहनत नष्ट कर देती है, तो कभी जंगलों में भीषण आग धधक उठती है। यह सब केवल प्राकृतिक संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ का प्रत्यक्ष परिणाम है। ब्रिटेन के महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि यदि मानव जाति ने ऊर्जा खपत और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं किया, तो पृथ्वी भविष्य में आग के गोले जैसी स्थिति में पहुंच सकती है। आज की भयावह गर्मी उसी दिशा की गंभीर चेतावनी प्रतीत होती है।
पर्यावरण संरक्षण को बनाना होगा जनआंदोलन
ऐसे समय में केवल सरकारों के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाना होगा। पौधरोपण, जल संरक्षण, ऊर्जा की बचत, प्रदूषण नियंत्रण और सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने होंगे और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर रोक लगानी होगी। जहां तक नौतपा का प्रश्न है, भारतीय परंपरा में इसे संयम और सावधानी का समय माना गया है। इन दिनों लोगों को दोपहर की धूप से बचने, अधिक पानी पीने, हल्का भोजन करने और लंबी यात्राओं से बचने की सलाह दी जाती है। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को भी इस अवधि में टालने की परंपरा रही है। स्पष्ट है कि इस बार का नौतपा केवल मौसम की एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी बनकर सामने आ रहा है। यदि मानव जाति ने अभी भी प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी, तो आने वाले वर्षों में धरती पर जीवन और अधिक कठिन हो सकता है। आज आवश्यकता केवल गर्मी से बचने की नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने की है, जिसने विकास के नाम पर प्रकृति को विनाश की ओर धकेल दिया है, क्योंकि प्रकृति जब संतुलित रहती है तो जीवन देती है, लेकिन जब उसका संतुलन बिगड़ता है तो वही प्रकृति विनाश का सबसे बड़ा कारण भी बन जाती है।