भारत को ऐसी पारदर्शी और पूर्वानुमेय प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिसमें ईंधन मूल्य निर्धारण केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर न रहे। एक व्यावहारिक मॉडल यह हो सकता है कि सरकार कच्चे तेल के लिए एक सामान्य मूल्य दायरा तय करे, जैसे 65 से 90 डॉलर प्रति बैरल। इस दायरे के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार सामान्य रूप से बदलती रहें।
प्रो. गौरव वल्लभ, प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य
आज दुनिया का ऊर्जा बाजार केवल मांग और आपूर्ति से नहीं चल रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, समुद्री व्यापार में बाधाएं और तेल उत्पादक देशों की रणनीतियां अब कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। हाल के महीनों में ब्रेंट क्रूड कई बार 90-95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के आसपास पहुंचा है। अनुभव बताता है कि भू-राजनीतिक कारणों से बढ़ी तेल कीमतें अक्सर लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं। भारत के लिए यह एक बड़ी आर्थिक चुनौती है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो आमतौर पर पेट्रोल और डीजल की कीमत लगभग 4-5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ जाती है, जिससे आम परिवारों का घरेलू बजट प्रभावित होता है। परिवहन महंगा होता है, महंगाई बढ़ती है और उद्योगों की लागत पर दबाव आता है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में एक अलग स्थिति देखने को मिली। वैश्चिक बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में सीमित बदलाव हुआ। इसका एक बड़ा कारण यह था कि तेल विपणन कंपनियों-इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम-ने लागत बढऩे का पूरा बोझ तुरंत उपभोक्ताओं पर नहीं डाला। इससे लोगों को अल्पकालिक राहत जरूर मिली, लेकिन कंपनियों पर कम मार्जिन और वित्तीय दबाव बढ़ा। यह व्यवस्था थोड़े समय के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन लंबे समय में इसके कई दुष्प्रभाव सामने आते हैं। पहला असर निवेश पर पड़ता है। जो संसाधन रिफाइनरियां आधुनिक तकनीक, हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में लगा सकती थीं, उनका एक हिस्सा मूल्य स्थिर रखने में खर्च हो जाता है। दूसरा असर बाजार संकेतों पर पड़ता है। जब कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहती हैं, तो उपभोक्ता और उद्योग वास्तविक लागत का सही संकेत नहीं समझ पाते। ईंधन बचत, सार्वजनिक परिवहन और बेहतर लॉजिस्टिक्स की दिशा में बदलाव धीमा पड़ जाता है। यहीं पर नियम-आधारित व्यवस्था की जरूरत सामने आती है। भारत को ऐसी पारदर्शी और पूर्वानुमेय प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिसमें ईंधन मूल्य निर्धारण केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर न रहे। एक व्यावहारिक मॉडल यह हो सकता है कि सरकार कच्चे तेल के लिए एक सामान्य मूल्य दायरा तय करे, जैसे 65 से 90 डॉलर प्रति बैरल। इस दायरे के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार सामान्य रूप से बदलती रहें। लेकिन जब कीमतें इस सीमा से ऊपर जाएं, तब एक स्वचालित राहत व्यवस्था लागू हो। उदाहरण के लिए, सीमित कर समायोजन (एक्साइज ड्यूटी में कमी) पर विचार किया जा सकता है और कुछ भार उपभोक्ताओं द्वारा वहन किया जा सकता है। इससे अचानक झटके कम होंगे और पूरी व्यवस्था अधिक पारदर्शी बनेगी। यह व्यवस्था केवल कीमत बढऩे के समय ही नहीं, बल्कि कीमत घटने के समय भी काम करे। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हो, तब उसका एक हिस्सा उपभोक्ताओं को मिले और दूसरा हिस्सा ‘फ्यूल स्टेबलाइजेशन फंड’ में जमा किया जाए। यही कोष भविष्य में कीमत बढऩे पर राहत देने के काम आ सकता है। सरल शब्दों में कहें तो अच्छे समय की बचत कठिन समय में उपयोग हो।
भारत के पास ऐसी व्यवस्था लागू करने की क्षमता भी है। पिछले दस वर्षों में आधार, यूपीआई और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) जैसे डिजिटल सार्वजनिक ढांचे ने सरकार की क्षमता को काफी मजबूत किया है। अगर तेल कीमतों में अचानक तेज बढ़ोतरी होती है, तो सरकार किसानों, ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों और गरीब परिवारों को सीधे लक्षित सहायता दे सकती है। इससे सभी उपभोक्ताओं के लिए कृत्रिम रूप से कीमतें दबाकर रखने की आवश्यकता कम होगी। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले वर्षों में पारदर्शिता, डिजिटलीकरण और संस्थागत सुधारों पर लगातार जोर दिया है। यही सोच ऊर्जा मूल्य निर्धारण में भी अपनाई जा सकती है। तेल कंपनियों को अधिक वित्तीय स्थिरता मिलेगी, राज्य सरकारें कर ढांचे में सहयोग दे सकेंगी और उपभोक्ता भी धीरे-धीरे यह समझ पाएंगे कि छोटे और नियमित मूल्य बदलाव एक स्वस्थ और पारदर्शी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
स्वाभाविक रूप से, ईंधन मूल्य निर्धारण केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक विषय भी है। इसलिए किसी भी नई व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू करना अधिक व्यावहारिक होगा। भारत इससे कहीं अधिक जटिल सुधार सफलतापूर्वक लागू कर चुका है। जीएसटी और आधार जैसे बड़े सुधारों ने दिखाया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत समन्वय हो, तो कठिन बदलाव भी संभव हैं। उनकी तुलना में नियम-आधारित ईंधन स्थिरीकरण व्यवस्था कहीं अधिक सरल और व्यावहारिक है। आवश्यक डेटा, संस्थागत क्षमता और नीतिगत उपकरण पहले से उपलब्ध हैं; जरूरत केवल उन्हें एक स्पष्ट और समन्वित ढांचे में जोडऩे की है। आज वैश्विक ऊर्जा बाजार लगातार अनिश्चित हो रहा है। ऐसे समय में लक्ष्य अस्थिरता को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उसे स्पष्ट नियमों और संतुलित नीतियों के माध्यम से बेहतर ढंग से प्रबंधित करना होना चाहिए। यदि भारत बाजार संकेतों और संस्थागत सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन बना सके, तो वह न केवल आर्थिक स्थिरता को मजबूत करेगा बल्कि भविष्य के वैश्विक झटकों का सामना भी अधिक आत्मविश्वास और मजबूती के साथ कर सकेगा।