-Dadaji maharaj का शाकाहार मूलमंत्र है। -मृत्युभोज और त्रयोदशी का निषेध किया। -छोटा परिवार-सुखी परिवार के भी हिमायती -अंतरजातीय और विधवा विवाह अनुमण्य
आगरा। राधास्वामी (Radhasoami) मत के वर्तमान आचार्य और अधिष्ठाता प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज Dadaji maharaj) का आज 90वां जन्मदिवस (Birth day( है। 27 जुलाई, 1930 को जन्मे दादाजी महाराज पिछले 60 साल से राधास्वामी सत्संग (Radhasoami satsang) की कमान संभाल रहे हैं। देश-विदेश में उनके करोड़ों अनुयायी हैं। उन्होंने राधास्वामी मत को नई दिशा दी है। वे सिर्फ भक्ति योग के मर्मज्ञ नहीं, बल्कि समाज सुधारक (social reformer) भी हैं। उन्होंने राधास्वामी (Radhasoami) मत के अनुयायियों के लिए विवाह की नई पद्धति दी है। इसमें न दहेज है और न ही कोई बाह्य दिखावा। गौरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। शाकाहार (Vegetatian) उनका मूलमंत्र है। मृत्युभोज का निषेध किया है। दादाजी छोटा परिवार-सुखी परिवार के भी हिमायती हैं। पीपलमंडी, आगरा स्थति हजूरी भवन (Hazuri bhawan) से दादाजी महाराज अपने करोड़ों अनुयायियों को प्रेम का संदेश देते हैं।
विवाह की नई पद्धति
प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर (Agam Prasad mathur) ने परंपरागत रूप से होने वाले विवाहों में विसंगतियों, दिखावा और अनावश्यक व्यय से होने वाली समस्याओं को निकटता से देखा। मंत्रों के प्रति अनभिज्ञता को देखा। इसे देखते हुए उन्हंने नई विवाह पद्धति की शुरुआत की। इसका शुभारंभ भी अपनी पुत्री के विवाह से किया। इसमें किसी भी प्रकार के दिखावे या तड़क-भड़क का पूर्ण निषेध है।
कैसे होता है विवाह
नई पद्धति में राधास्वामी मत के निवर्तमान आचार्यों की पवित्र समाध पर वर तथा वधू पक्ष वर्तमान आचार्य की अध्यक्षता में आयोजित विवाह सत्संग में उपस्थित होते हैं। परंपरागत पाठ के बाद समस्त सत्संग समाज के समक्ष विवाह प्रस्ताव पढ़ा जाता है। इसके बाद कन्या पक्ष की ओर से आग्रह किया जाता है कि वर उनकी कन्या को पत्नी के रूप में वरण करना स्वीकार करें। वर द्वारा अपनी लिखित एवं मौखिक स्वीकृति दी जाती है। इसके बाद जयमाल की रस्म होती है। वर-वधु पवित्र समाध और वर्तमान आचार्य के समक्ष माथा टेकते हैं। अंगूठियों का आदान-प्रदान करते हैं। गठबंधन किया जाता है। सप्तपदी की रस्म पूरी कर वर, कन्या की मांग में सिदूंर भरता है।
शपथ समारोह
मांग में सिंदूर भरने के बाद वर-वधू का शपथ समारोह होता है। सर्वप्रथम वर द्वारा कन्या को वधू रूप में स्वीकारने और सफल दाम्पत्य निर्वाह की प्रतिज्ञा ली जाती है। फिर कन्या द्वारा वर को पति के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की जाती है। फिर वर-कन्या अब पति-पत्नी के रूप में संयुक्त रूप से पारिवारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति जागरूक रहने और उनके सफल निर्वाह की शपथ लेते हैं। अंत में वर्तमान आचार्य द्वारा नवदंपति के दांपत्य जीवन में प्रवेश की आधिकारिक घोषणा करते हैं। उपदेश देते हैं। इसके साथ ही पाणिग्रहण संस्कार की प्रक्रिया पूरी होती है।
सजावट, बैंडबाजा, दावत और उपहार पर रोक
‘राधास्वामी मत परंपरा और दादाजी महाराज’ पुस्तक के लेखक डॉ. अमी आधार निडर बताते हैं कि इस विवाह पद्धति में सजावट, बैंडबाजा, दावत और उपहार के रूप में अनावश्यक खर्चों पर पूरी तरह से रोक है। विवाह के बाद मिष्ठान्न वितरण भी सत्संग समाज की ओर से किया जाता है। आवश्यक और दोनों पक्षों की सहमति से संयुक्त प्रीतिभोज सत्संग पद्धति से आयोजित होता है। इस पद्धित से दादाजी महाराज की अध्यक्षता में प्रतिवर्ष दर्जनों विवाह आय़ोजित हो रहे हैं, जिससे समय, शक्ति और धन के अपव्यय पर पूर्ण विराम लग गया है।
विधवा स्त्री को श्रृंगार अनुमण्य
प्रोफेसर माथुर ने अंतरजातीय विवाह को भी प्रोत्साहित किया है। इससे जातिभेद और वर्गभेद को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपने द्वितीय पुत्र का अंतरजातीय विवाह करके सत्संग समाज को यह संदेश दिया है। हिन्दू समाज में विधवा महिलाओं को तिरस्कार की नजर से देखा जाता है। प्रो. माथुर ने विधवा विवाह को समर्थन किया है। उनका मानना है कि विधवा विवाह भी नारी सशक्तिकरण की ओर एक ठोस कदम है। विधवा स्त्री से चूड़ी, बिन्दी, रंग और गंध छीनकर उसे कुरूप बनाना अन्याय और असंगत है। सत्संग समाज में विधवा को पूर्ण श्रृंगार को अनुमन्य किया गया है। विधवा स्त्री सभी मांगलिक कार्यों में उपस्थित रह सकती है।
संयुक्त परिवार और मृत्यु भोज
समाज सुधार की दिशा में प्रोफेसर माथुर ने संयुक्त परिवार को अपनाने का आह्वान किया है। हजूरी भवन में अनेक संयुक्त परिवार पल्लवित हो रहे हैं। इसी तरह सत्संग समाज में मृत्युभोज या त्रयोदशी पर पूर्ण प्रतिबंध है। परिजन की मृत्यु के बाद अनाथाश्रम, कुष्ठ आश्रम, महिला आश्रम, विधवा आश्रम, वृद्धाश्रम में दान की बात कही है।
शाकाहार, गौरक्षा और परिवार नियोजन
प्रोफेसर माथुर ने अपने 70वें जन्मदिवस पर शाकाहार आंदोलन शुरू किया। उन्होंने कहा कि अंडा भी नहीं खाना है। जो शाकाहारी नहीं है, उसके साथ कोई व्यवहार न रखा जाए। शाकाहार से विश्व का तनाव दूर हो सकता है। इसी तरह शराब के सेवन पर रोक है। दादाजी महाराज ने हर हाल में गाय की रक्षा करने क बात कही है। गोवध पर रोक होनी ही चाहिए। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा है कि वे छोटा परिवार की अवधारणा को सार्थक करें। यह सरकार के परिवार नियोजन अभियान की ओर एक सकारात्मक कदम है।