अहमदाबाद. कभी एक फैक्ट्री में केमिकल ऑपरेटर के रूप में काम करने वाले कल्पेश पटेल का जीवन उस समय पूरी तरह बदल गया, जब कैंसर के कारण उनके पिता रमण पटेल की मौत हो गई। बीमारी से पिता की मौत ने सूरत जिले की ओलपाड तहसील के सरस गांव के किसान कल्पेश ने प्राकृतिक खेती की राह चुनी।
अहमदाबाद. कभी एक फैक्ट्री में केमिकल ऑपरेटर के रूप में काम करने वाले कल्पेश पटेल का जीवन उस समय पूरी तरह बदल गया, जब कैंसर के कारण उनके पिता रमण पटेल की मौत हो गई। बीमारी से पिता की मौत ने सूरत जिले की ओलपाड तहसील के सरस गांव के किसान कल्पेश ने प्राकृतिक खेती की राह चुनी।
प्रकृति प्रेमी कल्पेश ने 2019 से प्राकृतिक खेती की शुरुआत की। उन्होंने गुजरात सरकार के कृषि विभाग से प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया और जीवामृत जैसे जैविक उत्पाद बनाना सीखा।
इसके बाद उन्होंने अपनी खेती को पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से विकसित करना शुरू किया।
उन्हें विरासत में लगभग आठ बीघा जमीन मिली थी। इनमें से साढ़े तीन बीघा जमीन पर उन्होंने केले की 50 से अधिक किस्मों की खेती शुरू की। पूवन, आधापुरी, रस्थली, लाल केला, ब्लू जावा, महालक्ष्मी और इलायची आदि दुर्लभ और विशेष किस्मों के केले उनके खेत में उगाए जाते हैं। उनके खेत में केले के गुच्छे का औसत वजन 30 किलो से अधिक रहता है। 2025 में उनके खेत में एक केले के गुच्छे का वजन 73 किलो तक पहुंच गया।
कल्पेश ने प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ने की वजह का खुलासा करते हुए कहा कि जब पिताजी खेती करते थे, तब वे खेत में बहुत अधिक कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करते थे और उनके पूरे शरीर से उस दवा की दुर्गंध आती थी। चूंकि मैं खेती से जुड़ा नहीं था, इसलिए उन्हें कुछ कहता भी नहीं था। लेकिन, जब उन्हें कैंसर हुआ और बाद में उनका निधन हुआ, तो मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया।
प्राकृतिक खेती से उन्हें आर्थिक रूप से भी बड़ा लाभ हुआ। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला प्रति बीघा 15 से 20 हजार रुपए का खर्च पूरी तरह बंद हो गया। मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने से उत्पादन बढ़ा और आज वे केवल केले की खेती से सालाना 10 से 12 लाख रुपए तक की आय अर्जित कर रहे हैं।
कच्चे केले न बिकने पर वे उससे वेफर और पाउडर जैसे उत्पाद बनाकर बेचते हैं। केले और अन्य उत्पाद सूरत के प्राकृतिक कृषि बाजारों में बिकते हैं और देशभर से उन्हें ऑर्डर मिलते हैं। आज उनके खेत को देखने के लिए किसान और कृषि वैज्ञानिक दूर-दूर से सरस गांव पहुंचते हैं।