Ajmer News -Kashmir Issue : ईद-उल-अजहा के मौके पर विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में सरहदी इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे। यह लोग आर्थिक या अन्य कारणों से हज पर नहीं जा पाते, इसलिए अजमेर आते हैं और हज की ख्वाहिश पूरी करते हैं। जम्मू-कश्मीर से इस बार इक्के-दुक्के लोग ही नजर आए।
अजमेर.धार्मिक मान्यता है कि कोई बीमार, आर्थिक कारण या शारीरिक अक्षमताओं के चलते हज (huj) पर नहीं जा पाता, वह ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह (ajmer dargah) स्थित जन्नती दरवाजे (jannati darwaja) से आस्ताना में प्रवेश कर मजार पर मत्था टेकता है। इसी ख्वाहिश के चलते जम्मू (jammu) से रांझा और मोहम्मद हुसैन भी अजमेर आए। उन्हें कफ्यू या धारा 144 के बारे में कुछ नहीं मालूम, उनका कहना था कि वहां हड़ताल चल रही है, इसलिए इस बार लोग कम आए हैं। जब उनसे धारा 370 हटाए जाने के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि हमें नहीं मालूम इससे क्या नफा और क्या नुकसान होगा। हम तो वहां खेती बाड़ी करते हैं। इसी तरह पीर मियां ने कहा कि रब ही जानें वहां सरकार क्या करेगी।
खादिम एस.एफ.हसन चिश्ती ने बताया कि बकरीद (bakaraeid) के मौके पर यहां कच्छ, भुज, बाड़मेर, जैसलमेर आदि सरहदी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में पशुपालक यहां पहुंचे। यह लोग रातभर जागकर विशेष इबादत करने के बाद सुबह जन्नती दरवाजे से गुजर कर ख्वाजा साहब के मजार पर मत्था टेकते हैं और हज की तमन्ना पूरी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जन्नती दरवाजे से सात बार गुजर कर जियारत करने से जन्नत नसीब होती है। इसलिए अकीदतमंद सात बार इस दरवाजे से गुजरते हैं। सरहदी क्षेत्रों से आने वाले लोग सालभर का लेखा जोखा यहा पेश करते हैं और वर्ष भर में होने वाले आपसी मनमुटाव को भी यहीं आकर दूर करते हैं।
बाड़मेर से आया पैदल
बाड़मेर से अली नामक व्यक्ति पैदल यात्रा कर अजमेर पहुंचा है। अली ने बताया कि वह पिछले 18 साल से बकरीद के मौके पर यहां आ रहा है। बाड़मेर से वह 10 दिन में यहां पहुंचा है।