- पैकेजिंग में काम आने वाला प्‍लास्टिक प्रतिबंध की सूची में शामिल नहीं- एफएमसीजी कम्‍पनियों के उत्पाद के छोटे पाउच प्रतिबंध दायरे से बाहर
रमेश शर्मा
अजमेर
जीवन के लिए खतरा बन रहे सिंगल यूज प्लास्टिक (एक बार इस्तेमाल होने वाला) पर 1 जुलाई के बाद पाबंदी होगी। केन्द्र सरकार वर्ष 2022 में देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करने का सपना देख रही है। पूर्ण पाबंदियां लागू होने का समय नजदीक आ रहा है, लेकिन पैकेजिंग में काम आने वाला प्लास्टिक और एफएमसीजी कम्पनियों के पाउच इससे बाहर रखे गए हैं, इससे इसमें संजीदगी कम और दिखावा ज्यादा नजर आता है। साथ ही प्लास्टिक कचरे को सीमित करने, ढुलाई, निस्तारण या रीसाइक्लिंग करने की प्रक्रिया पर कहीं भी गम्भीरता नहीं दिखाई दे रही है।
सिंगल यूज प्लास्टिक से छुटकारा पाने का समय रहते रास्ता तलाशा जा सके इसके लिए अगस्त 2021 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने इस पर रोक को लेकर अधिसूचना जारी की थी। इस पर 30 सिंबतर 2021 से पाबंदियां शुरू कर दी थी। अब 1 जुलाई 2022 तक इन पर पूर्णत: प्रतिबंध लग जाएगा। इसके उत्पादन, भंडारण, वितरण और इस्तेमाल से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी कर 30 जून से पहले इन पर पाबंदी की तैयारी पूरी करने को कहा है। पाबंदी को प्लास्टिक से पूरी तरह मुक्त होने का शुरूआती चरण कहा जा रहा है। भले ही प्लास्टिक दुनियाभर में पर्यावरण को बर्बाद कर रहा है, लेकिन यह रोजमर्रा की जिंदगी का इस कदर हिस्सा बन गया है कि इससे छुटकारा आसान नहीं है।
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खराब वेस्ट मैनेजमेंट
कूड़ा संग्रहण के दौरान उसमें मौजूद वास्तविक प्लास्टिक का अनुमान नहीं लगता। इससे कचरे का प्रबंधन भी सही तरीके से नहीं होता और निस्तारण प्रक्रिया प्रवाहित होती है। पर्यावरण जैसी बुनियादी जरूरतों पर बनाए गए सतत विकास लक्ष्यों में भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों की गिनती में है।
संशय क्यों ?
- सिंगल यूज प्लास्टिक का निस्तारण बड़ी चुनौती है। देश में हर साल करीब 40 लाख टन प्लास्टिक उत्पादन। इसमें से मात्र 10 से 13 फीसदी ही रिसाइकिल हो रहा, शेष संकट पैदा करता है।
- अरबों डॉलर का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पाद छोटे पाउच में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। एफएमसीजी यानी तेजी से बढऩे वाली उपभोक्ता कंपनियों की सिंगल यूज प्लास्टिक पाउच प्रतिबंध से बाहर।
- पैकेजिंग में काम आने वाला प्लास्टिक प्रतिबंध की सूची में शामिल नहीं। इस कचरे की हिस्सेदारी करीब साठ फीसदी है।
- प्लास्टिक उत्पादन करने वाली कंपनियों के प्रमाणन की कोई एजेंसी नहीं है। कंपनियां मनमाने तरीके से प्लास्टिक का उत्पादन करती है। प्लास्टिक पर नियंत्रण के लिए प्रमाणन की समुचित निगरानी जरूरी।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्वच्छ भारत मिशन के जरिए वेस्ट मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए कहा गया। दायित्व स्थनीय निकायों का होगा। सफलता पूरी तरह उनकी मंशा पर निर्भर।
- कम्पोस्ट होने वाली प्लास्टिक को बढ़ावा देने की जरूरत लेकिन देश में कम्पोस्ट प्लास्टिक के लिए उद्योगों की संख्या बहुत सीमित।
- आमजन की भागीदारी ही किसी भी कानून या अभियान सफलता तय करती है। लोगों की थैला लेकर ही बाजार जाने की मानसिकता बदलने से ही अभियान सफल हो पाएगा।
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फैक्ट फाइल
- देश में कुल शहरी क्षेत्र . 7935
- प्रतिदिन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है. 1.70 लाख टन
- पैकेजिंग प्लास्टिक का कचरा.. 60 फीसदी
- शहरी क्षेत्रों में निवारत लोग करीब 40 करोड़
- पॉलिथिन कचरे की हर साल रीसाइक्लिंग करीब 7.5 लाख टन
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एक्सपर्ट कमेंट
प्लास्टिक का साठ फीसदी से अधिक उपयोग तो सिर्फ पैकेजिंग में होता है। प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को इसे नष्ट करने या निस्तारण की जिम्मेदारी लेनी होगी। कचरे का प्रबन्धन, पुन:उपयोग और पुनर्निर्माण का दायित्व संबंधित निकायों का है, इसके लिए फिलहाल वैसी चिंता और गम्भीरता नहीं दिखती। बैग्स की मोटाई 75 माइक्रोन से कम होने पर सितम्बर से ही प्रतिबंधित कर दिए गए, लेकिन अब भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। इसके लिए पाबंदियों के साथ आमजन को जागरूक करने का अभियान भी साथ-साथ चलना चाहिए, तभी इसकी सफलता होगी। दूध की थैलियां किस तरह से बंद की जा सकती हैं, इसमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि लोग एक किलोग्राम थैलियों को वापस डेयरी को लौटाएं और निर्धारित रकम वापस ले जाएं। विकास और पर्यावरण दोनों की उपेक्षा नहीं हो सकतीए लेकिन विकास की कीमत पर पर्यावरण को कम से कम नुकसान होना चाहिए।
प्रो. प्रवीण माथुर, एमडीएस विवि अजमेर
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सिंगल यूज प्लास्टिक सबसे ज्यादा पैकेजिंग में इस्तेमाल हो रही है। पूर्ण रोक के लिए जरूरी है कि रीसाइक्लिंग तकनीक पर ज्यादा से ज्यादा काम हो। प्लास्टिक अनेक वर्षो तक मानव स्वास्थ्य और पृथ्वी के लिए खतरा बना रहता है। बेहतर उपाय यही है कि इसका कम से कम उत्पादन हो। कंपनियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि वे प्लास्टिक वापस लें और लोगों को छूट दें।
डॉ. धीरेन्द्र देवर्षि, प्रिंसीपल, आरडी गर्ल्स कॉलेज भरतपुर