वानिकी हस्तक्षेप यानी वनीकरण से राजस्थान की 'मरुगंगा' होगी निर्मल,- प्रदेश के कुल प्रवाह क्षेत्र का दस फीसदी से अधिक प्रवाह क्षेत्र है लूनी नदी का
रमेश शर्मा
अजमेर
वह दिन दूर नहीं जब प्रदेश की मरुगंगा कही जाने वाली लूनी नदी प्रदूषण के अभिशाप से तो मुक्त होगी ही, इसके अविरल बहने से मरुभूमि भी हरी-भरी हो पाएगी और भूमि कटाव रुकने से जलसंचय भी हो सकेगा। इस दिशा में केन्द्र सरकार ने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। नमामि गंगे की तर्ज पर लूनी सहित देश की 13 प्रमुख नदियों और इसकी दो सौ से अधिक सहायक नदियों को निर्मल और अविरल बनाने के लिए केन्द्र सरकार ने इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट डीपीआर जारी कर दी है। इसके तहत वनीकरण और नदी संरक्षण पर 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव है। अकेले लूनी नदी को संवारने के लिए 650 करोड़ रुपए खर्च किए जाने प्रस्तावित है। रिपोर्ट की मानें तो ये प्रमुख व सहायक नदियां देश के 57.45 फीसदी हिस्से के 18,90,110 वर्ग किलोमीटर बेसिन क्षेत्र को कवर करती हैं। 42,830 किमी लम्बी इन नदियों के ‘वानिकी हस्तक्षेप’ यानी पेड़-पौधे लगाने से फिर से पुनर्जीवित होने की आस जग गई है। साथ ही दावा किया जा रहा है कि इन प्रयासों से 7.48 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में मदद मिलेगी।
ये 13 नदियां, जिनमें बढ़ेगा नीर
नदियों की प्रवाह अविरल रहे, इस मंशा से जिन 13 नदियों को शामिल किया गया है, उनमें राजस्थान की लूनी के अलावा झेलम, चिनाब, रावी, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, ब्यास, सतलुज, यमुना, गोदावरी, महानदी, कृष्णा और कावेरी नदियां हैं। इसके तहत मृदा और जल संरक्षण, भू जल संवर्धन और अन्य वानिकी कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे नदियों के किनारे भूमि कटाव रूकेगा और जल संचय भी होगा।
अजमेर से बालोतरा तक तो पानी मीठा, फिर खारा
अजमेर की नाग पहाडि़यों से निकलने वाली लूनी नदी अजमेर, नागौर, जोधपुर, पाली, जालोर और बाड़मेर से बहती हुई गुजरात के कच्छ के रण में जाकर मिल जाती है। इसकी खासियत ये है कि इस नदी का पानी अजमेर से बाड़मेर तक तो मीठा है, लेकिन आगे रेगिस्तान में नमक के कणों के कारण इसका पानी खारा हो जाता है। यहां तक कि महाकवि कालीदास ने लूनी नदी को 'अन्तः सलिला' नदी कहा था। ये नदी प्रदेश के समस्त प्रवाह क्षेत्र के करीब 10.40 प्रतिशत भू भाग को कवर करती है। 495 किलोमीटर लम्बी ये नदी राजस्थान में 330 किमी तक बहती है।
ऐसे होगा लूनी का पुनर्जीवन, डेवलप होंगे रिवर फ्रंट
इसके तहत लूनी नदी के दोनों तरफ करीब दो-दो किलोमीटर में वन लगाकर मिट्टी का कटाव रोका जाएगा। सहायक नदियां जोजड़ी, लीलड़ी, मीठड़ी, जवाई, खारी, सुखडी, बाड़ी और सागी नदियों को भी कवर किया जाएगा। वनों को घना बनाने के साथ ही जल तथा मृदा संरक्षण पर जोर होगा। इससे क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आजीविका में भी वृद्धि तो होगी ही, वन्यजीव संरक्षण भी हो सकेगा। जोधपुर, पाली, बालोतरा जैस शहरी क्षेत्रों में रिवर फ्रंट डेवलपमेंट और इको पार्क डेवलपमेंट जैसे प्रयोग भी किए जाएंगे। साथ ही ओरण और गोचर भूमि को उपचारित किया जाएगा।
इनका कहना है...
सरकार का प्रयास बेहतरीन है। इससे निसंदेह लूनी नदी की हालत संवरेगी। विशेषकर लूनी पर 650 करोड़ रुपए खर्च होने से किसानों की तकदीर बदल जाएगी। यहां जलस्तर भी ऊंचा होगा तथा किसान भी ज्यादा पैदावार लेकर निहाल हो सकेंगे। प्रदूषण से मुक्ति के विशेष प्रयास होने चाहिए।
- पुखराज पटेल, किसान एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय, पाली
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लूनी : कुछ जरूरी तथ्य
- अजमेर की 772 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नाग पहाड़ियों से उद्गम
- 495 किलोमीटर में से राजस्थान में 330 किमी लम्बी
- सहायक नदियों की लम्बाई 1160 किलोमीटर
- प्रदेश के समस्त प्रवाह का क्षेत्र लगभग 10.40 प्रतिशत भू-भाग
- बेसिन जलग्रहण क्षेत्र- 11 जिलों अजमेर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, जैसलमेर, जालोर, जोधपुर, नागौर, - पाली, राजसंमद, सिरोही, उदयपुर में फैला। कुल 69302.10 किमी।
जानें महत्वपूर्ण फैक्ट
- 13 नदियों के कायाकल्प से 2030 तक कार्बन उत्सर्जन अनुमानित एक अरब टन कम करने व 2070 तक जीरो करने का लक्ष्य।
- हर साल 188.99 करोड़ घनमीटर तक भूजल के पुनर्भरण में मदद मिलेगी और हर साल 64,83,114 घनमीटर तलछट कम करने में मदद मिलेगी।
- ‘वानिकी हस्तक्षेप यानी नदियों के किनारे पौधे रोपे जाने से 10 साल पुराने रोपे गए वृक्षों के बराबर 5.02 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड और 20 साल पुराने वृक्षों के बराबर 7.48 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने में मदद मिलेगी।
- इससे अपेक्षित गैर-लकड़ी एवं अन्य वन उपज से 449.01 करोड़ रुपए की आमदनी की संभावना है।
- परियोजना रिपोर्टों के अनुसार 34.4 करोड़ मानव-दिवस रोजगार सृजित होंगे।