
अजमेर. किसी के मन में अगर सेवा की भावना हो तो धर्म-समाज कहीं आड़े नहीं आते। अजमेर के कई मुस्लिम युवा इन दिनों यही संदेश देकर रक्तदान की अलख जगा रहे हैं। यह युवा न केवल समय-समय पर रक्तदान शिविरों का आयोजन कर रहे हैं बल्कि जरूरत पडऩे पर रक्तदान के लिए दौड़ भी लगाते हैं। मित्तल अस्पताल में कार्यरत नागौर के राशिद खान तो दादा-पोता के नाम से रक्तदान शिविरों का आयोजन कर खुद की दादा-पोता के नाम से पहचान बना चुके हैं।
राशिद और इनकी मित्र मंडली को जब भी सोशल मीडिया या अन्य माध्यम से यह जानकारी मिलती है कि किसी को ब्लड की जरूरत है तो वे चाहे कितनी भी दूर हो पहुंच जाते हैं। इसी तरह गरीब नवाज वेलफेयर सोसायटी सहित अन्य कई संस्थाएं हैं जो आज रक्तदान शिविरों का आयोजन कर रक्त की कमी को पूरा कर रही हैं।
यहां तक कि कई युवा तो ऐसे हैं जो बिना बुलाए ही रक्तदान शिविर में पहुंच जाते हैं और स्वैच्छा से रक्तदान की आहुति दे आते हैं। इन युवाओं का मानना है कि इंसानियत ही उनका सबसे बड़ा धर्म है। धार्मिक नगरी के माहौल ने उन्हें भाईचारा सिखाया है। इसलिए धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर वे अलग-अलग नहीं रह सकते।
'रक्तदान से मिलती खुशी
अस्पताल में ऐसे कई लोग आते हैं जिन्हें जरूरत पडऩे पर ब्लड नहीं मिल पाता। यही देख कर मैंने वर्ष 2013 से रक्तदान शिविर लगाना शुरू किया। दादाजी ने भी यही सिखाया था, इसलिए दादा-पोता के नाम से शिविर लगाया। शुरुआत में 50 यूनिट रक्तदान हुआ लेकिन अब यह आंकड़ा 153 यूनिट तक पहुंच गया है।
-राशिद खान गरीब नवाज वेलफेयर सोसायटी की ओर से अब तक कई कैम्प लगाए जा चुके हैं। हमारी सोसायटी में कई मुस्लिम युवक हैं जो हर बार रक्तदान करते हैं।
-यामिन
हमारी सोसायटी की ओर से 5-6 बार शिविर लगाया जा चुका है। इसमें बढ़ चढ़ कर लोग रक्तदान करते हैं। सोसायटी के सदस्य जरूरत पडऩे पर अस्पताल जाकर भी रक्तदान कर रहे हैं।
-रियाज अहमदमैं कॉलेज समय से ही रक्तदान कर रही हूं। आज तक कोई तकलीफ नहीं हुई बल्कि रक्तदान के बाद खुशी महसूस होती है कि मेरा खून किसी की जिंदगी बचाने के काम आ सकेगा।
-सबा खान