www.patrika.com/rajasthan-news
अजमेर.
व्याख्याता बनने के लिए पसंदीदा रहे एमफिल पाठ्यक्रम ‘बदहाल’ हो गए हैं। नेट और पीएचडी की महत्ता बढ़ते ही एमफिल का दायरा सिमट चुका है। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में तो एमफिल पाठ्यक्रमों के बुरे हाल हैं। यह सिर्फ कागजों में संचालित हैं। ना प्रवेश परीक्षा ना दाखिलों का कोई अता-पता है।
विश्वविद्यालय में दस वर्ष पूर्व सात विषयों में एमफिल पाठ्यक्रम की शुरुआत हुई। इनमें एम.फिल एन्वायरमेंट मैनेजमेंट, फूड एन्ड न्यूट्रिशियन, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, एकाउन्टेंसी एन्ड फाइनेंशियल मैनेजमेंट, बिजनेस स्टेटिक्ट्सि और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विषय शामिल हैं। प्रत्येक विषय में 15-15 सीट का प्रावधान है।
नहीं हुई प्रवेश परीक्षा
विश्वविद्यालय ने पीएचडी प्रवेश परीक्षा की तरह एमफिल में दाखिलों के लिए भी परीक्षा तय की। इसमें सौ-सौ नम्बर के दो पेपर रखे गए हैं। पेपर प्रथम रिसर्च एप्टीट्यूड और पेपर द्वितीय संबंधित विषय का रखा गया है। विश्वविद्यालय ने इसे प्रवेश योग्यता परीक्षा (एईटी)का नाम दिया। पिछले चार साल में यह परीक्षा सिर्फ एक बार हुई है। इसके बाद एमफिल में दाखिले नहीं हुए हैं।
प्रोस्पेक्ट्स में जानकारी...
एमफिल पाठ्यक्रमों में नियमित प्रवेश और परीक्षा नहीं होने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष प्रोस्पेक्ट्स में इसकी सीट और जानकारी दे रहा है। सत्र 2018-19 के प्रोस्पेक्ट्स में भी इनका जिक्र किया गया है। ऐसा तब है जबकि पिछले दो-तीन सत्र में एमफिल पाठ्यक्रमों दाखिले नहीं हुए हैं। विद्यार्थियों का भी एमफिल में कोई रुझान नहीं रहा है।
अब नहीं है कोर्स की महत्ता...
यूजीसी ने वर्ष 2009-09 में व्याख्याता भर्ती नियमों में बदलाव किया। अब कॉलेज/विश्वविद्यालयों में सहायक आचार्यों की भर्ती के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करने सहित पीएचडी की अनिवार्यता लागू की है। इससे पहले एमफिल करने वाले अभ्यर्थियों को भी व्याख्याता भर्ती में पात्र समझा जाता था। नया नियम लागू होने के बाद एमफिल कोर्स की महत्ता सिमटती चली गई। ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में एमफिल पाठ्यक्रम बदहाल हो चुके हैं।