स्वामी दयानंद सरस्वती की 200 वीं पुण्यतिथि पर विशेष - अजमेर में 1891 में वैदिक यंत्रालय की स्थापना, पहले 'प्रकाश यंत्रालय' था नाम आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का अंतकाल अजमेर में गुजरा। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में आर्य समाज की संस्था परोपकारिणी सभा को चुना। परोपकारिणी सभा ने ही स्वामी दयानंद के बताए लक्ष्यों के अनुसार वेदों के प्रचार-प्रसार का जिम्मा लिया।
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का अंतकाल अजमेर में गुजरा। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में आर्य समाज की संस्था परोपकारिणी सभा को चुना। परोपकारिणी सभा ने ही स्वामी दयानंद के बताए लक्ष्यों के अनुसार वेदों के प्रचार-प्रसार का जिम्मा लिया। प्रचार सामग्री के प्रकाशन के लिए वैदिक यंत्रालय की स्थापना की। अजमेर में करीब 133 साल पूर्व वैदिक यंत्रालय की स्थापना हुई, जो आज भी केसरगंज में संचालित है।
'प्रकाश यंत्रालय' था मूल नाम12 फरवरी 1880 ई. को काशी के लक्ष्मीकुण्ड में विजयनगराधिपति के स्थान पर वैदिक यंत्रालय की स्थापना हुई। प्रारम्भ में इसका नाम ‘प्रकाश यंत्रालय’ रखा गया था जिसे बाद में वैदिक यंत्रालय कर दिया गया। दिसम्बर 1890 की परोपकारिणी सभा की वार्षिक साधारण सभा में प्रस्ताव पारित कर यंत्रालय को अजमेर स्थानांतरित किया गया। 1 अप्रेल 1891 को यंत्रालय अजमेर लाया गया।
मेरठ में पंजीकृत हुई थी परोपकारिणी सभास्वामी दयानन्द ने परोपकारिणी सभा की स्थापना मेरठ में 16 अगस्त 1980 को कर उपपंजीयक कार्यालय में पंजीकरण कराया। लाहौर निवासी लाला मूलराज को प्रधान तथा आर्य समाज मेरठ के उपप्रधान लाला रामशरणदास को मंत्री नियुक्त किया। सभासदों की संख्या 18 थी। सभा को अपने वस्त्र, धन, पुस्तक एवं यंत्रालय आदि के स्वत्व प्रदान किए। अन्य प्रतिष्ठित आर्य पुरुषों के अतिरिक्त थियोसॉफिकल-सोसायटी के संस्थापक- कर्नल एच. एस. ऑलकाट तथा मैडम एच. सी. ब्लावट्स्की भी इस सभा के सदस्य रहे। स्वामी 1883 में उदयपुर में परोपकारिणी सभा का पुनर्गठन कर उसे उदयपुर राज्य में 27 फरवरी 1883 को पंजीकृत कराया।
परोपकारिणी सभा ने लक्ष्य अनुरूप शुरू किए कार्य- वेद और वेदांगादि शास्त्रों के प्रचार, व्याख्यान, पठन-पाठन, श्रवण, प्रकाशन का कार्य।
- वेदोक्त धर्मोपदेश और देश-देशान्तर में सत्य के ग्रहण व असत्य का परित्याग।
- दीन मनुष्यों के संरक्षण, पोषण और सुशिक्षा व यज्ञादि कर्म।
- गुरुकुल परंपरा का निर्वहन। महर्षिकृत ग्रंथों का अध्ययन, आवास व्यवस्था भोजन आदि व्यवस्था।- ‘परोपकारी पत्रिका’ में वैदिक सिद्धान्तों पर आर्य विद्वानों के शोधपरक लेखों का प्रकाशन।
- महर्षि दयानन्द ने 19वीं शताब्दी में वेदों पर भाष्य रचना, सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि एवं ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका आदि ग्रन्थों का प्रणयन किया। इसके बाद से ही वैदिक पुस्तकालय महर्षि के सभी ग्रन्थों के प्रामाणिक व अधिकृत संस्करणों का प्रकाशन केंद्र बन गया।- ऋषि मेला : महर्षि दयानन्द सरस्वती के बलिदान दिवस के रूप में यह कार्यक्रम परोपकारिणी सभा द्वारा दीपावली के बाद आयोजित किया जाता है। यज्ञ, वेदपाठ, वेदोपदेश, भजन, प्रवचन, वेदगोष्ठी, व्यायाम-प्रदर्शन गतिविधियां होती हैं।
महर्षि दयानन्द सरस्वती संग्रहालयसंग्रहालय में महर्षि दयानन्द सरस्वती की वस्तुओं में दो दुशाले (तत्कालीन उदयपुर नरेश तथा शाहपुराधीश भेंट), कमण्डल, पादुका (खड़ाऊ), मसिपात्र, रेत घड़ी, चाकू, डाक तुला, हस्ताक्षर की मुहर, भोजन के पात्र, यज्ञ पात्र आदि वस्तुएं हैं। परिसर में गोशाला, ध्यान साधना शिविर, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम आदि हैं।
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स्वामीजी का अजमेर आगमन विवरण
आचार्य अंकित प्रभाकर ने बताया कि अजमेर में महर्षि दयानन्द सरस्वती का तीन बार आगमन हुआ।
- दिल्ली से जयपुर, जयपुर से अजमेर (7 नवम्बर 1878)
कार्य : पुष्कर के कार्तिक मेले में धर्म-प्रचार करने के लिए, उसके बाद नसीराबाद में उपदेश दिए।
- भरतपुर से जयपुर, जयपुर से अजमेर (5 मई 1881)- सेठ गजमल की हवेली में स्वामी के व्याख्यान, 8 से 30 मई तक 26 व्याख्यान। मसूदा व ब्यावर में जाकर धर्म-प्रचार किया।
- उदयपुर से शाहपुरा, शाहपुरा से अजमेर (27 से 29 मई 1883)
उदयपुर में तत्कालीन महाराणा सज्जन सिंह को राजधर्म का उपदेश किया, उन्हें मनुस्मृति, महाभारत आदि पढ़ाया। महाराणा सज्जनसिंह पहले सभापति नियुक्त, फिर शाहपुरा में नाहर सिंह शाहपुराधीश को भी राजधर्म का उपदेश देकर अजमेर आए। यहां स्वामीजी केवल 2 दिन रुके और धर्मोपदेश व शंका समाधान किया।