अलवर

Alwar: अलवर में यहां होता था रावण दहन, महाराजा जयसिंह चलाते थे तीर

अलवर में दशहरे का पर्व कभी शाही अंदाज में मनाया जाता था। उस समय रावण दहन के लिए बड़े पुतले बनाने के बजाय भगवान राम की प्रतीकात्मक सेना का विशाल जुलूस निकाला जाता था। महाराजा जयसिंह खुद इस आयोजन में शामिल होते और मंगलासर मैदान में तीर चलाकर रावण का वध करते थे।
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Oct 20, 2026
alwar dussehra
महाराजा सवाई तेज़ सिंह दशहरा पर्व पर सिटी पैलेस से हाथी पर सवार होकर रावण दहन के लिए जाते हुए

आज दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन अलवर में रियासत काल के दौरान दशहरा मनाने का तरीका अलग था। उस समय इस पर्व पर शाही लश्कर का जुलूस निकाला जाता था। इसकी खास बात यह थी कि महाराजा जयसिंह खुद भगवान राम के स्वरूप में रावण का वध करने पहुंचते थे। इस आयोजन का मुख्य केंद्र मंगलासर मैदान हुआ करता था।

पूर्व राज परिवार के निजी सचिव नरेंद्र सिंह के अनुसार, महाराजा जयसिंह दशहरे के दिन भव्य शाही सवारी के साथ शहर में निकलते थे। इस दौरान इंद्र विमान नाम के शाही रथ का भी उल्लेख मिलता है। रियासतकाल में रावण के पुतले की ऊंचाई बढ़ाने की परंपरा आज जैसी नहीं थी। इसके बजाय भगवान राम की प्रतीकात्मक सेना यानी लश्कर का जुलूस भव्य और विशाल बनाया जाता था।

शहर महल से मंगलासर मैदान तक निकलता था लश्कर

महाराजा जयसिंह की सवारी शहर महल से शुरू होती थी। जुलूस सर्राफा बाजार और बजाजा बाजार के लाल दरवाजे से होते हुए गणेश मंदिर वाले रास्ते से मंगलासर की ओर पहुंचता था। इस शाही लश्कर में पैदल सैनिक, घुड़सवार और तोपखाना भी शामिल रहते थे। हाथी पर सवार महाराजा की इस सवारी को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी।

मंगलासर मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले लगाए जाते थे। रावण दहन से पहले एक खास परंपरा निभाई जाती थी। दो घुड़सवार रावण के पुतले के पास पहुंचकर उसे समझाते थे कि वह भगवान राम की बात मान ले और माता सीता को वापस कर दे।

रावण के इनकार के बाद महाराजा चलाते थे तीर

परंपरा के अनुसार, घुड़सवारों के समझाने पर रावण का पुतला इनकार में गर्दन हिलाता था। इसके बाद दोनों घुड़सवार वापस आकर महाराजा को बताते थे कि रावण मानने को तैयार नहीं है। फिर महाराजा जयसिंह तीर चलाकर रावण के पुतले का दहन करते थे। महाराजा जयसिंह भगवान राम के भक्त थे और इस आयोजन के दौरान भगवान राम के स्वरूप में रहते थे।

दशहरे के बाद होता था विशेष भोज

रावण दहन के बाद अलवर शहर महल में विशेष भोज का आयोजन किया जाता था। इसमें राज परिवार के सदस्यों के साथ जागीरदार और अन्य खास लोग शामिल होते थे। वहीं, जनाना महल में भी गणमान्य महिलाएं पहुंचकर दशहरे की शुभकामनाएं देती थीं।

अलवर की यह शाही परंपरा बताती है कि पहले दशहरा केवल पुतला दहन का आयोजन नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक आस्था, शाही सवारी और शहर की सांस्कृतिक परंपराओं का भी खास स्थान था।

Updated on:
20 Oct 2026 12:04 pm
Published on:
20 Oct 2026 12:04 pm