अलवर के एक शमशान घाट में अपनी माता की अस्थियां लेने पहुंचे विनोद कुमार तो पता चला कि उनकी माता की अस्थियां कोई ओर ले गया और विसर्जन कर दी।
राजस्थान के अलवर शहर में स्थित 'तीज की श्मशान' घाट से एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। यहां नगर निगम की अव्यवस्था और मानवीय चूक के चलते एक मृतका की अस्थियां दूसरा परिवार चुनकर ले गया और उन्हें हरिद्वार में विसर्जित भी कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम के उजागर होने के बाद श्मशान घाट में पीड़ित परिवार ने जमकर हंगामा किया और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जानकारी के अनुसार, फूटी खेल निवासी राजू और सुनील की मां लल्ली देवी का निधन 23 मार्च को हुआ था, जिनका अंतिम संस्कार उसी दिन दोपहर में श्मशान घाट के शेल्टर (दाह स्थल) नंबर 2 पर किया गया था। हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक, जब बुधवार सुबह करीब सात बजे परिजन अपनी मां की अस्थियां संचय करने के लिए श्मशान पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गए। चिता वाले स्थान पर अस्थियां गायब थीं और केवल राख बिखरी हुई मिली। इस स्थिति को देखकर परिजनों का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने मौके पर ही विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
हंगामे की सूचना मिलते ही नगर निगम के पूर्व सभापति मुकेश सारवान भी श्मशान घाट पहुंचे। जब वहां मौजूद रिकॉर्ड और लकड़ी टाल के रजिस्टर की गहनता से छानबीन की गई, तो असलियत सामने आई। पता चला कि बुद्ध विहार निवासी चमरी देवी का निधन 22 मार्च को हुआ था और उनका संस्कार शेल्टर (दाह स्थल) नंबर 1 पर किया गया था। 24 मार्च को चमरी देवी के परिजन अपनी मां की अस्थियां लेने आए थे, लेकिन पहचान की भारी चूक के कारण वे शेल्टर नंबर एक के बजाय शेल्टर नंबर दो से लल्ली देवी की अस्थियां बीनकर साथ ले गए।
मामला तब और गंभीर हो गया जब पीड़ित परिवार ने चमरी देवी के परिजनों से संपर्क किया। फोन पर बातचीत में पता चला कि वे लोग उन अस्थियों को लेकर हरिद्वार पहुंच चुके थे और वहां विसर्जन की रस्म भी पूरी कर ली थी। इस बड़ी लापरवाही ने मृतका लल्ली देवी के बेटों को गहरा आघात पहुंचाया है, क्योंकि वे अपनी मां की अंतिम निशानी को सहेजने और विसर्जित करने के अधिकार से वंचित रह गए।
इस घटना के बाद पीड़ित पक्ष ने जिला कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने शिकायत में कहा कि श्मशान घाट में न तो किसी गार्ड की तैनाती मिली और न ही दाह संस्कार के स्थानों पर मृतकों के नाम की कोई पट्टिका या पहचान चिह्न लगाया जाता है। उन्होंने मांग की है कि भविष्य में किसी अन्य परिवार के साथ ऐसी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली गलती न हो, इसके लिए श्मशान में सुरक्षा गार्ड नियुक्त किए जाएं और शेल्टरों पर नाम लिखने की अनिवार्य व्यवस्था की जाए।
फिलहाल राजू और सुनील ने उसी राख से बची-खुची कुछ अस्थियां चुनकर पेड़ पर टांग दी हैं और दूसरे परिवार के हरिद्वार से लौटने का इंतजार कर रहे हैं ताकि आगे की कार्रवाई तय की जा सके।