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Alwar: अलवर नगर निगम चुनाव में निर्दलीय बनेंगे किंगमेकर?

अलवर नगर निगम चुनाव में इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला अहम माना जा रहा है, लेकिन असली खेल निर्दलीय पार्षद बिगाड़ या बना सकते हैं। पिछले दो निकाय चुनावों का इतिहास बताता है कि निर्दलीयों ने बोर्ड गठन और सत्ता के समीकरण तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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Aug 25, 2026
alwar nagar nigam
अलवर नगर निगम (फोटो - पत्रिका)

अलवर नगर परिषद (अब नगर निगम) के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो यहां सत्ता की चाबी कई बार निर्दलीय पार्षदों के हाथ में रही। पिछले दो चुनावों के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला चाहे जितना कड़ा रहा हो, बोर्ड बनाने में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक रही है।

इस बार भी 200 से अधिक निर्दलीय प्रत्याशी वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम के बाद एक बार फिर निर्दलीय किंग मेकर की भूमिका में नजर आ सकते हैं।

2019 में भाजपा आगे, फिर भी कांग्रेस का सभापति

वर्ष 2019 के नगर परिषद चुनाव में कुल 65 वार्ड थे। इनमें भाजपा ने 28 वार्ड, कांग्रेस ने 18 वार्ड और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 19 वार्डों में जीत दर्ज की थी। भाजपा के पास सबसे ज्यादा पार्षद होने के बावजूद कांग्रेस अपना सभापति बनाने में कामयाब रही। इसमें निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण रही और उन्होंने सत्ता की तस्वीर बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई।

2014 में भी निर्दलीयों ने तय किया था समीकरण

इससे पहले वर्ष 2014 में कुल 50 वार्डों में चुनाव हुआ था। भाजपा के 23, कांग्रेस के 13 और निर्दलीय 14 पार्षद जीतकर आए थे। भाजपा के पास स्पष्ट बढ़त थी और भाजपा का सभापति बना, लेकिन बोर्ड के गठन में निर्दलीयों का समर्थन महत्वपूर्ण रहा। यानी दोनों चुनावों में निर्दलीय पार्षद संख्या में कम नहीं रहे और उन्होंने सत्ता के समीकरणों को प्रभावित किया।

अलवर में जनता का रुझान केवल भाजपा और कांग्रेस जैसे प्रमुख दलों तक सीमित नहीं रहा है। बड़ी संख्या में मतदाता निर्दलीय उम्मीदवारों पर भी भरोसा जताते रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद निर्दलीय पार्षदों की संख्या एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।


किसके साथ जाएंगे निर्दलीय, इसी पर टिकेगा खेल

यदि निकाय चुनाव परिणाम में भाजपा और कांग्रेस में से किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अहम हो जाएगी। मेयर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए दोनों प्रमुख दल निर्दलीय विजेताओं का समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे। ऐसे में निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी बन सकते हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक दलों की नजर निर्दलीयों के रुख पर रहेगी। बहुमत के आंकड़े से दूर रहने वाली पार्टी को बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों का साथ जरूरी हो सकता है। यही वजह है कि चुनावी मुकाबले के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों के रुख पर भी सबकी नजर टिकी है।

Updated on:
25 Aug 2026 11:38 am
Published on:
25 Aug 2026 11:38 am