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Alwar News: नटनी का बारा से थैंक्यू बोर्ड तक रोड होगी एलिवेटेड, जानें सरिस्का में सड़क बनाना क्यों नहीं आसान

Sariska Road Project: सरिस्का 7 करोड़ की लागत से सड़क का निर्माण अब तक नहीं हो पाया है। मंजूरी के लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति जरूरी है, जिसकी प्रक्रिया चल रही है। वहीं, नटनी का बारा से थैंक्यू बोर्ड तक सड़क मार्ग को एलिवेटेड में कन्वर्ट करने की तैयारी चल रही है।

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May 17, 2026
सरिस्का एलिवेटेड रोड। पत्रिका फाइल फोटो

Sariska Tiger Reserve: अलवर। सरिस्का टाइगर रिजर्व में एक साल पहले 7 करोड़ की लागत से एक सड़क का निर्माण होना था, लेकिन यह अब तक नहीं बन पाई। इसके लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति जरूरी है, जिसकी प्रक्रिया चल रही है। वहीं, भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून मानता है कि सड़कें वन्यजीवों का रास्ता रोकती है। भोजन की तलाश कठिन हो जाती है। इसी को देखते हुए सरिस्का ही नहीं बल्कि देशभर के टाइगर रिजर्व में सड़कें बनाना आसान नहीं है। यही वजह है कि नटनी का बारा से थैंक्यू बोर्ड तक सड़क मार्ग को एलिवेटेड में कन्वर्ट करने की तैयारी चल रही है।

सरिस्का भ्रमण के बाद भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कमर कुरैशी ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) को एक रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा है कि सरिस्का के 50 फीसदी पक्षियों की प्रजातियां ही नहीं, 25 से ज्यादा वन्यजीवों की प्रजातियां भी इससे प्रभावित है। प्रतिबंधित गतिविधियों (होटल-रेस्टोरेंट, रिसॉर्ट आदि) के संचालन से वन्यजीवों की प्रजनन क्षमता ही नहीं प्रभावित होती, बल्कि उनके आहार, चारा खोजने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि सरिस्का में 275 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां हैं, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत मुख्य रूप से गर्मियों के अंत या मानसून के दौरान प्रजनन करती है। सबसे अधिक देखे जाने वाले स्तनधारी जीवों में लगभग 25 प्रजातियां शामिल है, जिनमें बाघ, तेंदुआ, बड़ी और छोटी बिल्लियां (जंगली बिल्ली, रेगिस्तानी बिल्ली). कैनिड्स (सियार, भेड़िया), लकड़बग्घा, कृतक (गैरबिल, गिलहरी), चीतल, सांभर शामिल है। साथ ही नीलगाय, नेवले और चमगादड़ भी मानसून के साथ ही प्रजनन करते हैं। ऐसे में यह जीव सड़कों को राह में बाधा मानते हैं। उसे क्रॉस नहीं करते है, जबकि क्रॉस करने के बाद वन्यजीवों के लिए पानी से लेकर आहार व सुरक्षित आवास आदि मुहैया होते हैं।

मार्ग टहला-नीलकंठ हो लेकर फंसा पेच

टहला-नीलकंठ मार्ग काफी समय पहले बनाया गया था। बताते हैं कि यह बिना एनबीडब्ल्यूएल की मंजूरी के ही बना है। इस मार्ग को फिर से बनाने की तैयारी है, लेकिन इसके लिए अनुमति जरूरी है। यह करीब 10 किमी लंबा है।

ये हैं सरिस्का में पक्की सड़कें

-नटनी का बारा से थैंक्यू बोर्ड तक, जिसे एलिवेटेड में कन्वर्ट करने की तैयारी है।
-कुशालगढ़ से तालवृक्ष तक।
-अजबगढ़ रोड।
-टहला से राजगढ़ रोड।

एनबीडब्ल्यूएल की मंजूरी के बिना नहीं बन सकती कोई सड़क

सरिस्का के पूर्व क्षेत्र निदेशक आरएस शेखावत कहते हैं कि टाइगर रिजर्व में सेंचुरी व सीटीएच एरिया में डामर या किसी भी प्रकार की सड़क बनाने के लिए बहुत सख्त नियम हैं। यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है और इसके लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की मंजूरी अनिवार्य है, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की ओर से रोक लगाई जा सकती है।

नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) और एनबीडब्ल्यूएल की अनुमति के बिना किसी भी तरह का पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता। यदि टाइगर रिजर्व में पहले से डामर सड़क है, तो केवल उसके रखरखाव की अनुमति मिल सकती है, न कि उसे चौड़ा करने या नया पक्का निर्माण करने की। ऐसे में कई जगहों पर पर्यावरण संरक्षण के लिए डामर की जगह अन्य विकल्प तलाशे जाने चाहिए।

सड़कों के कारण ऐसे होते हैं वन्यजीव प्रभावित

-सड़कें वन्यजीवों के आवासों को विभाजित करती हैं। जानवरों की आवाजाही कम होती है।
-आनुवांशिक विविधता कम हो जाती है. जो प्रजातियों की वास्तविकता और अनुकूलन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण है।
-वाहनों की टक्कर से वन्यजीवों की कई प्रजातियों की मृत्यु दर में वृद्धि हुई है।
-व्यवहार में बदलाव भी स्पष्ट हैं, क्योंकि सड़कों की मौजूदगी के
-कारण जानवर शोर, प्रकाश, प्रदूषण और मानव गतिविधि के कारण आस-पास के क्षेत्रों से दूर जा सकते हैं, जिससे तनाव, -प्रजनन में कमी, निवास स्थान से बचाव और निवास स्थान का उपयोग कम हो सकता है।
-सड़कों के किनारों का माइक्रो क्लाइमेट और वनस्पति में परिवर्तन होता है, जिससे आंतरिक निवास स्थितियों पर निर्भर रहने वाली प्रजातियों पर असर पड़ता है।
-इन प्रभावों को कम करने के लिए वन्यजीव गलियारों, ओवरपास, अंडरपास और आवास व्यवधान को कम करने के लिए रणनीतिक योजना को लागू करना शामिल है।
-सड़कों का प्रभाव हर मौसम में अलग-अलग होता है। अधिकांश प्रजातियां मानसून के करीब या बरसात के मौसम में प्रजनन करती हैं। क्योंकि इस मौसम को वन्यजीव भोजन से लेकर सुरक्षा के लिए मुफीद समझते हैं।

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