
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच अब वाहनों से निकलने वाले धुएं के साथ गाड़ी के अंदर पहुंचने वाले प्रदूषक कणों पर भी नियंत्रण की तैयारी है। इसके तहत वाहनों के अंदर प्रदूषण के स्तर पर नजर रखने और लोगों को जहरीले कणों से बचाने के उपायों पर जोर दिया जा सकता है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) की विशेषज्ञ समिति ने वाहनों में विशेष एयर फिल्टर अनिवार्य करने और सड़क से गुजरते समय ही उनके उत्सर्जन की जांच करने सहित कई अहम सुझाव दिए हैं। इन सिफारिशों पर अमल होता है तो एनसीआर में शामिल अलवर में भी वाहन प्रदूषण की निगरानी और जांच व्यवस्था को लेकर नई व्यवस्था लागू करने की जरूरत पड़ सकती है।
समिति की अंतरिम रिपोर्ट में ऐसे फिल्टर लगाने का सुझाव दिया गया है, जो हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे बेहद बारीक कणों और हानिकारक गैसों को रोकने में मदद करें। इसके साथ ही वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (वीओसी) को भी ध्यान में रखा गया है। ये रसायन हवा में मिलकर लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं। हालांकि, फिल्टर लगाने का नियम कब से लागू होगा और किन श्रेणियों के वाहनों पर इसकी अनिवार्यता होगी, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर निगरानी के लिए समिति ने सड़क किनारे विशेष उपकरण लगाने की सिफारिश की है। इसके जरिए निजी और व्यावसायिक वाहनों को रोके बिना उनके उत्सर्जन में मौजूद प्रदूषकों की मात्रा मापी जा सकेगी। कैमरों से नंबर प्लेट पढ़कर जांच के परिणाम वाहन के रिकॉर्ड से जोड़े जा सकेंगे। समिति ने 1 अप्रेल, 2028 से इस तरह की जांच अनिवार्य करने का सुझाव दिया है।
नई व्यवस्था का उद्देश्य केवल प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की पहचान करना नहीं, बल्कि उन्हें निर्धारित उत्सर्जन सीमा के भीतर लाना भी है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की दोबारा जांच कराई जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर उनकी मरम्मत भी करानी होगी। इसके लिए देश में ही जांच उपकरण तैयार करने पर जोर दिया गया है, ताकि तकनीक की लागत कम हो सके और मौजूदा प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) व्यवस्था को मजबूती मिले।