जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) इन दिनों प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारियों के ऐसे चक्र में फंसे हैं कि स्कूलों की मॉनिटरिंग और शैक्षणिक गुणवत्ता पर ध्यान देने के लिए उनके पास समय ही नहीं बच रहा।
जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) इन दिनों प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारियों के ऐसे चक्र में फंसे हैं कि स्कूलों की मॉनिटरिंग और शैक्षणिक गुणवत्ता पर ध्यान देने के लिए उनके पास समय ही नहीं बच रहा। हर महीने 5 से 6 बार जयपुर की कोर्ट पेशियों के साथ विभागीय बैठकों का दबाव बढ़ गया है। प्रारंभिक और माध्यमिक दोनों डीईओ को हर माह 6 से 8 बार कोर्ट में पेश होना पड़ता है। इसके अलावा 2 से 4 बार जयपुर में होने वाली विभागीय बैठकों में शामिल होने जाना पड़ता है। इनके अलावा हर महीने 8 से 10 ऑनलाइन मीटिंग और जिला कलक्टर स्तर की 4 से 5 बैठकों में भी अनिवार्य रूप से उपस्थिति देनी पड़ती है।
डीईओ प्रारंभिक शिक्षा कार्यालय में 250 से अधिक कोर्ट केस लंबित हैं। इनमें अधिकतर मामले नियुक्ति विवाद, एसीपी (आश्वस्त करियर प्रगति), वेतन लाभ, ट्रांसफर और सेवा संबंधी मुद्दों से जुड़े हैं। डीईओ माध्यमिक शिक्षा के पास केवल 4 प्रमुख केस हैं, लेकिन विभागीय जिम्मेदारियां समान रूप से बनी रहती हैं। कई बार डीईओ को कोर्ट में अपनी जगह प्रतिनिधि भेजना पड़ता है, जिससे मामलों की प्रभावी पैरवी भी प्रभावित होती है।
स्कूलों का निरीक्षण कब करें?
लगातार कोर्ट पेशी और बैठकों के कारण डीईओ का अधिकतर समय कागजी और प्रशासनिक कामों में निकल रहा है। ऐसे में स्कूल का निरीक्षण नहीं हो पा रहा। शिक्षकों की उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता पर निगरानी कमजोर हुई है। नवाचार योजनाओं और शिक्षा सुधार कार्यक्रमों पर ध्यान कम हो रहा है। हालांकि अधिकारी देर रात तक ऑफिस में बैठकर काम निपटाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस तरह के कोर्ट केस ज्यादा
-ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर विवाद
-पदोन्नति और वेतन विसंगतियां
-अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामले
ये हो सकते हैं समाधान
-जिला स्तर पर लीगल सेल को मजबूत किया जाए
-छोटे मामलों का निपटारा विभागीय स्तर पर ही हो
-डीईओ के लिए अलग से “फील्ड मॉनिटरिंग डे” तय किए जाएं
-ऑनलाइन मीटिंग की संख्या सीमित की जाए