पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बार फिर से ये बता दिया कि राजनीति में रिश्ते से बड़ा पद और कद की चाहत होती है
आजमगढ़. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बार फिर शिवपाल के करीबी कहे जाने वाले पूर्व मंत्री बलराम यादव को बड़ा पद देकर न सिर्फ शिवपाल के राजनीतिक रिश्ते को कमजोर किया । बल्कि राजनीति करने वालों को ये भी बता दिया है कि राजनीति में रिश्तों से बड़ा पद और कद की चाहत होती है।
बतादें कि पिछले दो दशकों की राजनीति में बलराम यादव का कद कभी कमजोर नहीं हुआ। जब तक नेताजी के हाथ में सपा की कमान रही तब तक बलराम का राजनीतिक कद बढ़ता ही रहा। नेता जी के साथ ही शिवपाल के साथ भी बलराम के रिश्ते में कभी खटास नहीं आई लेकिन कहीं न कहीं यूपी चुनाव से पहले सपा में हुई बगावत का खामियाजा बलराम यादव को भुगतना पड़ा था। जिसके बाद बलराम की खूब किरकिरी हुई थी। पर सबकुछ होने के बावजूद भी बलराम ने सपा में अखिलेश के बढ़ते कद के साथ ही उनके खेमें में जाने को सही माना। आखिरकार अब उन्हे एक बार फिर सपा में महासचिव बनाकर अखिलेश यादव ने उनका कद बढ़ा दिया है।
कोएद था बहाना, शिवपाल से रिश्ते ने बिगाड़ा था बलराम का खेल
बतादें कि यूपी चुनाव से पहले कौमी एकता दल में सपा के विलय का सूत्रधार बलराम यादव को ही माना गया था। बलराम यादव ने शिवपाल के कहने पर सपा में कौएद का विलय करा दिया था। पर ये बात अखिलेश यादव को बहुत ही नागवार गुजरी। उन्हे लगा कि सपा में अगर इसी तरह के फैसले शिवपाल लेते रहे तो सपा में उनका कद कमजोर हो जायेगा। लोगों की मानें तो शिवपाल और बलराम यादव का यह मीठा रिश्ता अखिलेश यादव को खटक गया और उन्होने बलराम को पार्टी से बाहर निकाल दिया। लेकिन ये बात मुलायम को नागवार गुजरी और उन्होने बलराम की फिर से सपा में वापसी कराई।
रिश्ते भूल बहती हवा के साथ बहने लगे बलराम यादव, बनाये गये महासचिव
आखिरकार बलराम यादव नेता जी के साथ खिलाड़ी तो थे ही। ऐसे में उन्होने भी सपा में अखिलेश यादव के बढ़ते कद को भांप लिया। चुनाव के समय में ही शिवपाल से किनारा कर अखिलेश यादव के खेमें में जाना उचिस समझा और अखिलेश की जैकार करने में जुट गये। फिर क्या था चुनाव हुआ सरकार गई लेकिन अखिलेश पर भरोसा करने का बलराम को फायदा हुआ। उन्होने बलराम यादव को महासचिव बनाकर एक बार फिर से बलराम को कद बढ़ा दिया है।