जन्म मरण से मुक्ति दिलाने वाली एवं परम अवस्था सिद्ध मुक्त को प्राप्त करने वाली है
मैसूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ सिद्धार्थनगर सीआइटीबी परिसर में श्रुत मुनि ने कहा कि 'सामायिक में समता का बोधÓ मेें भगवान महावीर ने 2 प्रकार की नाव, पहली भौतिक एवं दूसरी आध्यात्मिक बताई है। भौतिकता की चकाचौंध में मनुष्य के पथभ्रष्ट होने का खतरा बना रहता है, लेकिन आध्यात्मिक नाव भव भव से तिराने वाली है। जन्म मरण से मुक्ति दिलाने वाली एवं परम अवस्था सिद्ध मुक्त को प्राप्त करने वाली है। सामायिक कष्ट, बाधा का नाश करके समता भाव, कर्म निर्जरा कराने वाली होती है। मन, वचन, काया को स्थिर रखते हुए भाव, विचारों की शुद्धता के द्वारा सामायिक की जाए तो परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। कमलाबाई खिवेंसरा ने 10 की तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
मनुष्य जीवन में ही धर्म आराधना संभव
चामराजनगर. गुंडलपेट स्थानक में साध्वी साक्षी ज्योति ने कहा कि आत्मा को धर्म करने का अवसर एकमात्र मनुष्य जन्म में मिलता है। चौरासी लाख जीव भवों में से अन्यत्र किसी स्थान पर धर्म की आराधना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जो आराधना हम मनुष्य जीवन में स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं। अपनी भावना के अनुरूप कर सकते हैं और इसीलिए हमारे यहां कहा जाता है कि नर से नारायण बना जा सकता है। आत्मा से परमात्मा बनने की क्षमता यदि किसी प्राणी में है तो वह मनुष्य जीवन है।
सबको प्रिय है शांति
श्रीरामपुरम जैन स्थानक में साध्वी दिव्य ज्योति ने कहा कि 'ढाई अक्षर का एक शब्द है शांतिÓ। विश्व का हर जीव, हर प्राणी, हर मानव शंाति चाहता है। सबको शांति प्रिय है। उन्होंने कहा कि आत्मा शांति का इच्छुक है और उसी शांति के लिए उसके प्रयत्न पारम्य है। हम आत्मा के शांति प्रयासों की सुदीर्घ परंपरा को लक्ष्य में रखकर उसके परिणामों का तोल करते हैं तो वहां हमारे हाथ केवल शून्य लगता है। इसका मतलब हमने अशांति के वृक्ष की डाली, पत्तों को काटा है, पर उसकी जड़ की ओर हमारा लक्ष्य ही नहीं है। बीज समाप्त नहीं होता तब तक वृक्ष पैदा ही होंगे।