
बैंगलोर । राष्ट्र-संत ललितप्रभ महाराज और डाॅ. मुनि षांतिप्रिय सागर महाराज के सान्निध्य में राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज का 39 वां दीक्षा दिवस विमलनाथ जैन मंदिर , गोविंदप्पा रोड़, बसवनगुड़ी में आनंद-उत्सव के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने सैकड़ों दीपक जलाए और ज्योत से ज्योत जलाओ सद्गुरु ज्योत से ज्योत जलाओ, मेरा अंतरतिमिर मिटाओ...गीत गाकर गुरुपद की आरती उतारी और दीर्घायु संयम जीवन की षुभकामनाएं समर्पित की।
राष्ट्र-संत ललितप्रभ महाराज ने कहा कि चन्द्रप्रभ ने दीक्षा लेकर न केवल स्वयं के जीवन को धन्य किया है वरन् हजारों लोगों के जीवन का कायाकल्प किया है। आज मैं कुछ भी हूं, वह उन्हीं की प्रेरणा का कमाल है। चन्द्रप्रभ ने 38 साल के संयम जीवन में देशभर में जो मानवीय कल्याण के कार्य किए हैं और सर्वधर्म सद्भाव का माहौल खड़ा किया है वह अद्भुत है। आज श्री चन्द्रप्रभ पंथ-परम्पराओं की संकीर्ण सीमा लाँघकर सबके बन चुके हैं। सचमुच इस मानवतावादी राष्ट्र-संत को विश्वभर में करोड़ों पाठकों एवं श्रोताओं द्वारा प्रतिदिन पढ़ा एवं सुना जा रहा है जो कि हम सबके लिए प्र्रेरणा स्रोत है।
। दूसरों की आत्मकथाएँ पढ़कर दस पन्ने में ही सही, आप अपनी भी आपबीती आत्मकथा लिख लीजिए...
उन्होंने कहा कि खुद का समीक्षण करके ही स्वयं का रूपांतरण किया जा सकता है। दूसरों की आत्मकथाएँ पढ़कर दस पन्ने में ही सही, आप अपनी भी आपबीती आत्मकथा लिख लीजिए। खुद की आत्मकथा पढने से आप में चमत्कारी परिवर्तन आएगा। अपने आप से पूछिए कि क्या आपने कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनी है? यदि नहीं तो अपने अन्तरमन से मुलाकात कीजिए। धैर्य और शांिन्त धारण कीजिए, आपको भीतर से किसी शान्त संगीत की तरह आत्मा की प्रेरणाएँ प्राप्त होती हुई नजर आएँगी।
इस दौरान डाॅ. मुनि षांतिप्रिय सागर ने कहा कि श्री चन्द्रप्रभ जी वर्तमान युग के महान जीवनद्रष्टा संत हैं। उनका जीवन प्रेम, प्रज्ञा, सरलता और साधना से ओतप्रोत है। वे न केवल मिठास भरा जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं वरन अपने जीवन में भी मिठास और माधुर्य घोले रखते हैं। वे आम इंसान के बहुत करीब हैं। उनके द्वार सबके लिए खुले हुए हैं। चाहे कोई भी क्यों न हो उनसे मिलकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। उनके पास बैठकर व्यक्ति को जो अनुपम आनंद, ज्ञान और सुकून मिलता है वह उसे आजीवन भुला नहीं पाता है।
जीवन धन्य तभी होगा जब हम षिक्षा, दीक्षा के साथ समीक्षा से भी गुजरेंगे...
इस अवसर पर राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि मैं बड़ा किस्मत वाला हूं कि मेरे माता-पिता ने भी संयम जीवन अंगीकार किया और वसीयत के रूप में मुझे भी संयम जीवन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि हम संयम ले सकें तो अति उत्तम अन्यथा हमें अपने जीवन की समीक्षा करते रहना चाहिए। जीवन धन्य तभी होगा जब हम षिक्षा, दीक्षा के साथ समीक्षा से भी गुजरेंगे। हमें रोज चिंतन करना चाहिए कि मैंने अपने जीवन में क्या पाया क्या खोया। मैंने अपने लिए क्या किया और औरों के लिए क्या किया।
उन्होंने कहा कि ज्ञान तीन प्रकार से मिलता है-1. किताबों से - यह सबसे सरल है। 2. अनुभव से - यह सबसे कड़वा है। 3. अन्तरमन से - यह सबसे श्रेष्ठ है। आप शिक्षा, ज्ञान और विद्या को इतना महत्त्व दीजिए कि आप चलती-फिरती लाइब्रेरी बन जाएँ। याद रखिए, पैसा वही है, जो अंटी में हो और ज्ञान वही है, जो कंठी में हो। ज्ञान जितना भी हासिल करें, मनोयोगपूर्वक हासिल करें। उचटे मन से पढ़े गए 100 पन्नों की बजाय मन से पढ़े गए 10 पन्ने अधिक परिणाम देंगे।
याद रखें, ज्ञान तभी पूज्य बनता है, जब उसके साथ विनम्रता हो...
उन्होंने कहा कि हर रोज 20 मिनट ही सही, पॉजिटिव और मोटिवेशनल किताबें अवश्य पढ़ें। एक प्रेरक वचन या प्रेरक प्रसंग आपकी बुद्धि के लिए विटामिन-सी का काम करेगा। ज्ञान को अपने जीवन की रोशनी बनाएँ। ज्ञान अगर कृष्ण है तो आचरण अर्जुन। कृष्ण और अर्जुन का संयोग बैठ जाए तो जीवन का महाभारत निश्चित तौर पर जीता जा सकता है। याद रखें, ज्ञान तभी पूज्य बनता है, जब उसके साथ विनम्रता हो। यदि हम अहंकार के गुलाम हैं, तो समझो अज्ञान हम पर हावी है, पर यदि हम विनम्रता के पुजारी हैं, तो इसका मतलब है ज्ञान का प्रकाश हमारे पास सुरक्षित है। बुद्धि की निर्मलता के लिए रोज सुबह ध्यान कीजिए और रात को सोने से पहले स्वाध्याय। इससे आप दिनभर दिव्य मनःस्थिति के मालिक रहेंगे और रात को दुस्वप्नों से बचे रहेंगे।
इस अवसर पर संघ रत्न महेन्द्र रांका ने कहा कि श्री चन्द्रप्रभ वाणी में न केवल गजब का सम्मोहन है वरन उनके साहित्य में भी एक विशेष आकर्षण है। प्रायः अच्छा लेखक अच्छा वक्ता नहीं होता और अच्छा वक्ता अच्छा लेखक नहीं होता, पर माँ सरस्वती की कृपा से वे जितना अच्छा बोलते हैं उतना ही अच्छा लिखते भी हैं। इस दौरान संघ प्रवक्ता अरविंद कोठारी ने कहा कि श्री चन्द्रप्रभ यानी नई उम्मीद, नया उत्साह, नई ऊर्जा। आनंद और आत्मविश्वास से भरा उनका जीवन और साहित्य नई पीढ़ी के लिए रामबाण औषधि का काम कर रहा है। इस अवसर पर आदोनी संघ अध्यक्ष रमणलाल षाह ने कहा कि श्री चन्द्रप्रभ जी के विचार सशक्त, तर्कयुक्त, परिमार्जित एवं सकारात्मकता की आभा लिए हुए हैं। उनके विचारों में कृष्ण का माधुर्य, महावीर की साधना, बुद्ध की मध्यम दृष्टि, कबीर की क्रांति, मीरा की भक्ति और आइंस्टीन की वैज्ञानिक सच्चाई है। उन्होंने ईंट, चूने, पत्थर से निर्मित मंदिरों को ही बनाते रहने की बजाय घर-परिवार को मंदिर बनाने और घर से धर्म की शुरुआत करने की क्रांतिकारी प्रेरणा देकर धर्म को व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक बनाने का अनुपम कार्य किया है।