बैंगलोर

उपधान तप कर्म निर्जरा का उत्तम साधन: चंद्रशयश सूरी

सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम में उपधान तप की साधना का श्रीगणेश
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jaiji
उपधान तप कर्म निर्जरा का उत्तम साधन: चंद्रशयश सूरी

बेंगलूरु. उपधान तप कर्मों की निर्जरा की अनूपम साधना है। यह तप हमें अविरिति से विरति धर्म की ओर अग्रसर कराता है। यह तप निकाचित कर्मों का क्षय करता है। परम पुण्योदय तथा अहोभाग्य से ही हमें ऐसा तप करने का अवसर मिलता है।

उपधान तप माने आंतरिक शुद्धि का महोत्सव है। उपधान तप यानी हमारे निज स्वरूप की पहचाने का प्रयास है। आचार्य चंद्रयश सूरीश्वर ने यह बात कही।

सोमवार को सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम में आचार्य तथा प्रवर्तक कलापूर्ण विजय की निश्रा में महामंगलकारी उपधान तप की आराधना का श्रीगणेश हुआ।

सुबह चतुर्मुखी परमात्मा के सन्मुख तीन प्रदक्षिणा के साथ यह आराधना शुरू हुई। धर्मसभा में आचार्य ने कहा कि इस तप के कारण आत्मा जिस प्रकार से अलौकिक सूख की अनूभूति करती है यह सुख बेमिसाल होता है।

इस आराधना के दौरान हम भौतिक पुदगलों के आकर्षणों से विमुख होकर एक जैन साधु जैसी दिनचर्या को अपनाते हैं।

इस तप की आराधना के दौरान हम शांतचित्त होकर परमात्मा के साथ जुडऩे का प्रयास करते हैं। इस साधना के दौरान मिलने वाला सत-चित-आनंद किसी भी भौतिक पुदगलों में नहीं मिलता है।

यह तप हमें भौतिक सुख तथा आकर्षणों से विमुख होकर आत्मकल्याण के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। आज तक हमने शरीर का शृंगार तथा बाह्य शुद्धता पर काफी ध्यान दिया है, लेकिन आंतरिक शुद्धि की अनदेखी की है।

उपधान तप की आराधना हमें जीवन के वास्तविक लक्ष्य को लेकर चिंतन-मंथन करने के लिए प्रेरित करती है। उपधान तप हमारी आत्मा को जगाने का प्रयास है। यह तप हमें भौतिक पदार्थों की नश्वरता का बोध कराने के साथ-साथ आत्मकल्याण के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

उपधान तप में पहला प्रवेश हो गया है। दूसरा प्रवेश बुधवार को होगा। उपधान समिति के सदस्य कैलाश वेदमूथा ने कहा कि जो महानुभावों को उपधान तप आराधना में उन्हें तीर्थस्थल पर पधार सकते हैं।

अवसर पर समिति के सदस्य तेजराज संचेती तथा विमलचन्द कर्णावट उपस्थित थे।

Published on:
20 Nov 2018 04:44 pm