भारी तत्वों की कमी के बावजूद ३० लाख प्रकाश वर्ष दूर स्थित छोटे आकार की एक क्षुद्र आकाशगंगा में काफी तेजी से नए तारों का निर्माण होरहा है
बेंगलूरु. भारी तत्वों की कमी के बावजूद ३० लाख प्रकाश वर्ष दूर स्थित छोटे आकार की एक क्षुद्र आकाशगंगा में काफी तेजी से नए तारों का निर्माण होरहा है। आम तौर पर धात्विकता (भारी तत्वों की मौजूदगी) कम होने होने पर आकाशगंगा में नए तारों का निर्माण काफी कम होता है लेकिन तारों की निर्माण फैक्ट्री कही जा रही इस आकाशगंगा से जुड़े नए तथ्यों ने खगोलविदें की उलझनें बढ़ा दी हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की ओर से अंतरिक्ष में स्थापित पहले स्वदेशी खगोल वेधशाला एस्ट्रोसैट ने आकाशगंगा वुल्फ लुंडमार्क मेलोट्टे (डब्ल्यूएलएम) का अध्ययन कर इस अबूझ रहस्य को उजागर किया है। इस अध्ययन में एस्ट्रोसैट के वैज्ञानिक उपकरण (पे-लोड) अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (यूवीआईटी) का उपयोग किया गया।
पराबैंगनी तस्वीरों से अबूझ रहस्य खुला
भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान, बेंगलूरु के प्रोफेसर (से.नि.) रमेश कपूर ने कहा कि एस्ट्रोसैट से प्राप्त तस्वीरें एवं जानकारियां भारतीय वैज्ञानिकों के लिए बहुमूल्य साबित हो रही हैं हमारी आकाशगंगा एंड्रोमेडा और कुछ अन्य आकाशगंगाएं मिलकर एक समूह बनाती हैं, जिसे लोकल गु्रप कहते हैं।
इसमें कुल 19 सदस्य हैं। लोकल गु्रप से थोड़ा बाहर की ओर सीटस की यह छोटी आकाशगंगा 30 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। यूवीआईटी से दूर-पराबैंगनी और निकट पराबैंगनी में ली गई तस्वीरों को जोडक़र जो तस्वीर बनाई गई है उसे इसरो ने जारी किया है। इसमें नीले और पीले बिंदु नजर आ रहे हैं जो उन तारापुंजों के हैं जहां नए तारों का निर्माण तेजी से हो रहा है। नीले बिंदु दूर पराबैंगनी तस्वीरों और पीले बिंदु निकट पराबैंगनी तस्वीरों से है।
संपूर्ण वेधशाला है एस्ट्रोसैट
गौरतलब है कि प्रकाश के वर्णक्रम के विभिन्न हिस्सों में अंतरिक्ष का अध्ययन करने के लिए विभिन्न कक्षाओं में नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) ने अनेक वेधशालाएं स्थापित की हैं मगर भारत का एस्ट्रोसैट खगोल के लिए पूरी तरह समर्पित एक संपूर्ण वेधशाला है। अंतरिक्ष से आती एक्स किरणों को पकडऩे के उपकरणों के अलावा यह एक बायनोक्यूलर दूरबीन से भी सुसज्जित है। इन दूरबीनों में दर्पण 38 सेमी व्यास (लगभग 15 इंच) के हैं। विकिरण के दूर पराबैंगनी, निकट पारबैंगनी तथा दर्शनीय प्रकाश के अध्ययन के लिए ये दूरबीन बेहद उपयुक्त हैं। इसे 28 सितम्बर 2015 को अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था।
तारों की निर्माण दर 12 गुणा ज्यादा
इसरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल ही में सीटस नामक तारा समूह की दिशा में एक छोटे आकार की आकाशगंगा पर एस्ट्रोसैट की पैनी दृष्टि पड़ी। इसके बाद यूवीआईटी से ली गई तस्वीरों के अध्ययन से भारतीय खगोलन वैज्ञानिकों को इस आकाशगंगा के कई रहस्यों का पता चला। मुख्य रूप से इस आकाशगंगा में आशा के विपरीत तारों के सक्रिय निर्माण की गतिविधि का पता चला। यह हमारी आकाशगंगा से हजारों गुणा कम भारी है और इसके तारों में भारी तत्वों की कमी है,जो सूर्य के सापेक्ष केवल 13 फीसदी है।
तारों में भारी तत्वों की कमी एक ऐसा कारण होता है जिससे नए तारों के निर्माण दर बहुत ही कम रहती है लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलटी है। डब्ल्यूएलएम नाम की इस क्षुद्र आकाशगंगा में भारी तत्वों की कमी के बावजूद नए तारों की निर्माण दर हमारी आकाशगंगा के मुकाबले 12 गुणा ज्यादा है। इस तथ्य ने वैज्ञानिकों को आश्चर्य में डाल दिया है।