बांसवाड़ा. स्वतंत्रता के आंदोलन में वागड़ अंचल का भी विशिष्ट योगदान रहा है। अंग्रेजी शासन के दौरान तत्कालीन सत्ताधीशों से संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों के सहयोग से लेकर आजादी के ठीक पहले प्रजामंडल की स्थापना तथा तत्समय सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन में वागड़ अंचल ने स्वतंत्रता के विभिन्न आंदोलनों में कदमताल कर झण्डा बुलंद किया।

बांसवाड़ा के संदर्भ में देखें तो यहां गोविंद गुरु, गौरीशंकर उपाध्याय, बाबा लक्ष्मणदास, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, हरिदेव जोशी, नटवरलाल भट्ट, मास्टर सूरजमल, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर, मोहनलाल त्रिवेदी, बाबूलाल जौलाना, कन्हैयालाल सेठिया, भंवरलाल निगम सहित कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने देश की खातिर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। अंगे्रजों की लाठियां खाई, लेकिन आजादी के सपने को साकार करने में एक कदम पीछे नहीं हटाया।
तात्या टोपे से मिली ऊर्जा
1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे दो बार बांसवाड़ा आए। वे इस वर्ष अगस्त और दिसम्बर में बांसवाड़ा आए। दूसरी बार आने पर उन्होंने बांसवाड़ा को घेरा और जीता। इसके बाद यहां क्रांति की जो मशाल जली, उसकी ऊर्जा आजादी प्राप्त करने तक मिलती रही। इसी ऊर्जा का प्रभाव रहा कि आदिवासी से लेकर विभिन्न समाजों के युवा आजादी के आंदोलन से जुड़े।
रक्त से सनी मानगढ़ की पहाड़ी
तत्कालीन समय में शोषित भीलों को एकसूत्र में बांधने में अहम भूमिका गोविंद गुरु ने निभाई। स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रभावित गोविंद गुुरु ने 1905 में सम्प सभा की स्थापना की। इस सभा के माध्यम से चले धर्म व समाज सुधार आंदोलन ने आदिवासियों में नवजीवन का संचार किया। अन्याय के खिलाफ आवाज मुखर होने लगी। इससे अंगे्रज सतर्क हो गए। अप्रेल 1913 में गोविंद गुुरु को राजद्रोह के अभियोग में गिरफ्तार किया गया। रिहा होने के बाद उन्होंने मानगढ़ पहाड़ी पर डेरा जमाकर राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक जागरुकता की अलख जगाई, लेकिन 17 नवम्बर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई। पूरी पहाड़ी रक्त से सन गई। लाशों के ढेर लग गए।
समरसता पर जोर
मानगढ़ में हुई घटना के बाद भी आंदोलन में शिथिलता नहीं आई। वागड़ गांधी भोगीलाल पण्ड्या ने अशिक्षा का अंधेरा मिटाने सहित सामाजिक समरसता, आदिवासियों के शैक्षणिक उन्नयन पर काम शुरू किया। 1932 में बाबा लक्ष्मणदास, मदनसिंह तोमर आदि के सहयोग से हरिजन सेवक समिति की स्थापना की। माणिक्यलाल वर्मा ने वागड़ सेवा मंदिर की स्थापना कर रात्रि पाठशालाओं के जरिए हरिजनों और आदिवासियों को शिक्षा से जोडऩे का प्रयास किया। पण्ड्या ने 15 मार्च 1938 को सेवा संघ की स्थापना की। इसके माध्यम से आदिवासियों को शिक्षा और कृषि के प्रति रुचि पैदा करने, औजार उपलब्ध कराने, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन जैसी गतिविधियां चलाई। रचनात्मक कामों में गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी, बाबा लक्ष्मणदास जैसे सेनानियों का योगदान रहा।
प्रजामंडल का गठन
बाबा लक्ष्मणदास, धूलजी भाई भावसार, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर और भूपेंद्रनाथ द्विवेदी आदि ने बांसवाड़ा में शिक्षा प्रचार, हरिजन उद्धार और जिलों की दशा सुधारने का कार्य किया। 1930 में चिमनलाल मालोत ने शांत सेवा कुटिर की स्थापना कर राजनीतिक चेतना का प्रसार किया। 1943 में प्रजामंडल की स्थापना हुई। अध्यक्ष सहयोगी सदस्य धूलजी भाई मणिशंकर, सिद्धिशंकर झा, मोतीलाल आदि थे। इसमें दिला भगत, सेवा मछार, दीपा भगत आदि का सहयोग मिला। प्रजामंडल के विभिन्न प्रकोष्ठ गठित हुए। तत्कालीन महारावल ने प्रजामंडल की सभाओं पर रोक लगा दी। इसके विरोध में नगर में हड़ताल हुई। बाद में इस रोक को वापस लिया गया। भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी के मुंबई से आकर बांसवाड़ा की राजनीति में प्रवेश करने से प्रजामण्डल को मजबूती मिली।
उत्तरदायी सरकार का गठन
जनता की राजनीतिक जागृति देखकर तत्कालीन शासक ने विधानसभा के चुनाव करवाए। प्रजामंडल ने इसमें भाग लिया और 45 में से 35 सीटों पर जीत दर्ज की। उत्तरदायी सरकार मंत्रीमंडल में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुख्यमंत्री, मोहनलाल त्रिवेदी विकास मंत्री, नटवरलाल भट्ट राजस्व मंत्री और चतरसिंह जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। यह मंत्रिमंडल 18 दिन तक कार्यरत रहा।
महिलाओं की भी भूमिका
आजादी के आंदोलन में महिलाओं की भी अहम भूमिका रही। इसमें शकुंतला देवी व विजया बहन का नाम प्रमुख है। प्रजामंडल का सहयोगी संगठन महिला मंडल विजया बहन भावसार के नेतृत्व में गठित किया गया। 24 फरवरी 1946 को हुए जनांदोलन के दौरान तत्कालीन रियासत के प्रधानमंत्री मोहनसिंह मेहता के बंगले के घेराव में महिलाओं ने भी जुलूस निकाला था।