
माटी से मेडल तक-
डूंगरपुर . हर साल 29 अगस्त को हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर मनाया जाने वाला राष्ट्रीय खेल दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक ऊर्जा, शारीरिक दक्षता और रणनीतिक सोच का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड है। आज का दौर, जहां स्क्रीन-टाइम बढ़ रहा है और शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं, खेल दिवस को केवल एक इवेंट के रूप में नहीं बल्कि एक सामाजिक क्रांति के रूप में देखने की मांग करता है। इस क्रांति की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसका केंद्र अब महानगरों के वातानुकूलित क्लब नहीं, बल्कि देश के गांवों, कस्बों और दूर-दराज की माटी हैं। 21वीं सदी में खेल दिवस की प्रासंगिकता हो गई है। स्वास्थ्य सुरक्षा और डिजिटल डिटॉक्स के बीच आज की युवा पीढ़ी अवसाद, मोटापा, और डिजिटल निर्भरता जैसी आधुनिक समस्याओं से जूझ रही है। खेल दिवस इस बात का अहसास कराता है कि मैदान में बहाया गया पसीना मानसिक और शारीरिक दृढ़ता की सबसे बेहतरीन खुराक है।
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पारंपरिक और स्वदेशी खेलों का पुनरुत्थान
प्रमोशन ऑफ रूरल, इंडिजिनस एंड ट्राइबल गेम्स और खेलो इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से मलखंभ, कलारीपयट्टू, गतका, खो-खो और थांग-ता को राष्ट्रीय दर्जा और बजटीय सहायता मिली है। प्रो-कबड्डी लीग और महिला प्रीमियर लीग ने ग्रामीण खिलाडिय़ों को न केवल आर्थिक स्थिरता दी है, बल्कि उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया है। गांवों में जहां कभी लड़कियों का बाहर निकलना भी चुनौती था, वहां आज बेटियां पूरे गांव और देश का मान बढ़ा रही हैं। वहीं खेल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बजटीय आवंटन बढ़ा है, लेकिन ब्लॉक व पंचायत स्तर पर अब भी कमी है। हर पंचायत स्तर पर बुनियादी मैदान और उपकरण उपलब्ध कराना जरूरी है। बायोमैकेनिक्स, न्यूट्रिशन और फिजियोथेरेपी की पहुंच केवल राष्ट्रीय अकादमियों और बड़े शहरों तक सीमित है, इसे तहसील स्तर तक ले जाना होगा। प्रतिभाएं देर से पहचानी जाती हैं, इसलिए पीईटी को आधुनिक कोचिंग प्रशिक्षण और पहचान का अधिकार देना समय की मांग है।
कन्हैयालाल व्यास,
वरिष्ठ शारीरिक शिक्षक, सूरजगांव, सागवाड़ा
खेल हमें हर पल जीना सिखाता है
न हारना जरूरी है न जितना जरूरी है, जीवन एक खेल है बस खेलना जरूरी है। खेल में हार जीत इतना मायने नहीं रखता मायने रखता है कि हमने खेल को कितने आनन्द और खेल भावना के साथ खेला। खेल इंसान के आत्मसम्मान को बढ़ाता है और समाज से जोड़ता है। एक अच्छा खिलाड़ी समाज का एक अच्छा इंसान बनता है। खेल समाज से अलग नहीं है। खेल और समाज का पुराना नाता है जब समाज प्रभावित होता है तो खेल भी प्रभावित होता है। खेल डिप्लोमेसी से समाज और देश में शांति और सहयोग का मार्ग खुलता है। खेलों को उत्कृष्टता, समावेशन ओर एकता की शक्ति माना गया है। खेलों के माध्यम से हम भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में अपना अहम योगदान दे सकते हैं। खेल और मैदान हमें जिम्मेदारी लेना सिखाते हैं। खेल हमें कोशिश व संघर्ष करना सिखाते हैं। खेल में शक्ति, बुद्धि, योजना और अनुशासन का उपयोग होता है और इसी से हार और जीत का निर्णय होता है। आज देश में सोशल मीडिया की लत से कई जेन जी का भविष्य प्रभावित हो रहा है। युवाओं में मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से उनमें एकाकीपन और तनाव बढ़ रहा है। युवाओं को अपनी ऊर्जा को खेल जैसी रचनात्मक गतिविधि में लगाने से उनका व्यक्तित्व निखरेगा और भविष्य अधिक उज्जवल बनेगा।
हरिश पाटीदार अम्बाड़ा, वरिष्ठ शारीरिक शिक्षक
राउमावि पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा