
गेस्ट राइटर-रमेशचन्द्र शर्मा, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, सागवाड़ा।
सागवाड़ा. संस्कृत दिवस भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के आदेश से 1969 में सर्वप्रथम केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर मनाया गया। प्रतिवर्ष हिंदू पंचांग अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। प्राचीन भारत में इसी दिन से शिक्षण सत्र और वेद पाठ आरंभ होता था, इसी पूर्णिमा से छात्र शास्त्रों का अध्ययन प्रारंभ करते थे। ऋषियों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए भी इसी दिन को चुना गया है, क्योंकि यही ऋषि हमारे संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत हैं। संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने और युवा पीढ़ी को जोडक़र इसके महत्व को प्रतिपादित करना संस्कृत दिवस मनाने का मूल उद्देश्य है। यह भाषा भारत की सबसे प्राचीन भाषा है और इसी से अन्य भाषाओं की उत्पत्ति हुई है इसलिए संस्कृत सब भाषाओं की जननी है और इन सभी में यह विशेष स्थान रखती है क्योंकि यह परिष्कृत, परिमार्जित, पूर्ण, अलौकिक और पवित्र है। इसीलिए इसे देववाणी भी कहा जाता है जो हमारी सभ्यता और संस्कृति की आत्मा है।
हमारे वेद, उपनिषद, पुराण आदि इसी भाषा में रचे गए हैं। इतना ही नहीं जैन और बौद्ध धर्म के कुछ प्रमुख ग्रंथ भी संस्कृत भाषा में रचित हैं। आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित जैन ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र जैन धर्म का सबसे पहला और सर्वमान्य ग्रंथ है। इसी प्रकार आचार्य अकलंक देव की ओर से रचित प्रश्नोत्तरी तालिका व न्याय मुकुंद चंद्र आदि पुराण शब्द शासन संस्कृत में रचित हैं। आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित और खगोल विज्ञान के प्राचीन ग्रंथ भी संस्कृत में ही उपलब्ध हैं। आर्यभट्ट और वराह मिहिर जैसे वैज्ञानिकों ने अपने महान शोध कार्य को इसी भाषा में लिखा है जिसकी प्रामाणिकता और प्रासंगिकता वर्तमान समय में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए संस्कृत भाषा को सबसे स्पष्ट और सटीक माना गया है। महाभारत काल में भी वैदिक संस्कृत का उपयोग किया जाता था।
संस्कृत भाषा अध्ययन, अध्यापन एवं शोध कार्य में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। संस्कृत भाषा में नियम और व्याकरण एकदम स्पष्ट, तार्किक एवं पक्के हैं इसलिए इसका उपयोग नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग को समझने एवं कंप्यूटर में हो रहा है, वैज्ञानिक इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कोडिंग के लिए उपयोगी मानते हैं। दैनिक जीवन में संस्कृत भाषा का साहित्य, श्लोक एवं प्रार्थनाएं हमें अनुशासन और सकारात्मकता प्रदान करते हैं, मन को शांत करते हैं, बच्चों की स्मरण शक्ति, एकाग्रता और तर्कशक्ति का विकास होता है।
भारतीय गौरव प्रतीकों और ध्येय वाक्यों में भी संस्कृत भाषा को बहुत सम्मान प्राप्त है। मुंडकोपनिषद से लिया गया सत्यमेव जयते अशोक स्तंभ में उल्लेखित है। संसद भवन की आंतरिक दीवारों और कक्षों में संस्कृत में प्रेरणादायक श्लोक उत्कीर्ण हैं। बीएसएनएल, भारतीय जीवन बीमा निगम सैन्य कमानों आदि के ध्येय वाक्य यथा अहर्निशं सेवामहे, योगक्षेमं वहाम्यहं भी संस्कृत में हैं। निश्चय ही संस्कृत भाषा का भविष्य उज्जवल और संभावनाओं से भरा हुआ है। अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों के विश्वविद्यालय संस्कृत पर विशेष शोध एवं अध्ययन कर रहे हैं। हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसे शीर्ष संस्थान विशेष पाठ्यक्रम चला रहे हैं। जर्मनी के हाइडलबर्ग और हम्बर्ग विश्वविद्यालय में संस्कृत व्याकरण और पांडुलिपियों पर गहन शोध किया जा रहा है।
Updated on:
28 Aug 2026 06:02 am
Published on:
28 Aug 2026 06:02 am
