
सागवाड़ा. शाहपुरा धाम के रामस्नेही संत कीर्तिराम ने कहा कि मनुष्य जब मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए आता है तो भगवान से प्रार्थना करता है। प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण अथवा संकट की घड़ी में की जाने वाली याचना नहीं है, वह आत्मा का परमात्मा से होने वाला पवित्रतम संवाद है।
कांहडदास धाम बड़ा रामद्वारा में गुरुवार को संत ने कहा कि प्रार्थना का वास्तविक चमत्कार बाह्य परिस्थितियों को बदलना नहीं, अपितु साधक के अन्त:करण को परिवर्तित करना है। जब अन्त:करण निर्मल होता है, तब विपत्तियां भी साधना का अवसर बन जाती हैं और असंभव प्रतीत होने वाले मार्ग भी प्रशस्त होने लगते हैं। उन्होंने बताया कि प्रार्थना मनुष्य के भीतर सुप्त श्रद्धा, धैर्य, विवेक, साहस और आत्मबल को जागृत करती है। जीवन में जब भय, तनाव, चिन्ता और निराशा का अन्धकार छा जाता है, तब प्रार्थना ही अन्त:शान्ति का सर्वोच्च आश्रय बनती है। प्रार्थना मन को स्थिरता, बुद्धि को स्पष्टता और हृदय को विश्वास प्रदान करती है कि परम करुणामय ईश्वर प्रत्येक क्षण हमारे साथ हैं तथा उनकी कृपा सदैव हमारा पथ आलोकित कर रही है।
महाराज ने कहा कि सच्ची प्रार्थना मांग नहीं, समर्पण है। प्रार्थना का सर्वोच्च स्वरूप मौन है। जब शब्द समाप्त हो जाते हैं और हृदय केवल ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता है, तब वही मौन आत्मा का वास्तविक संगीत बन जाता है। वहीं अहंकार गलता है, कृपा अवतरित होती है और साधक अपने वास्तविक स्वरूप के समीप पहुंचता है।
संत ने कहा कि प्रार्थना केवल व्यक्तिगत हित तक सीमित न रहकर समस्त सृष्टि के मंगल की भावना बन जाती है। प्रार्थना दुर्बलता नहीं, आत्मबल का जागरण है, पलायन नहीं, परम सत्य की ओर प्रस्थान है। सत्संग के दौरान ‘भजन करो प्रिये’ भक्ति गीत पर समस्त भक्तगण झूम उठे। संत प्रसाद अनिल सोनी परिवार की ओर से कराया गया। प्रवक्ता बलदेव सोमपुरा ने बताया कि सत्संग में सुरेंद्र शर्मा, अनिल सोनी, देवीलाल सोनी, विष्णु भावसार, कलावती भावसार, राजेश्वरी शर्मा, प्रेमलता सुथार, करुणा भट्ट मौजूद रही।