एक दिव्यांगजन करीब दो माह से मूल निवासी पत्र बनाने के लिए ई-मित्र व तहसील दफ्तर के चक्कर लगाने को मजबूर है। लेकिन अभी तक भी उसका मूल निवासी प्रमाण पत्र नही बन पाया है।
मूल निवासी प्रमाण पत्र के लिए दो माह से चक्कर काट रहा दिव्यांग
बारां. यूं तो समाज कल्याण विभाग कई शिविर लगाकर दिव्यांगजनों को राहत देने की बात करता है। लेकिन एक दिव्यांगजन करीब दो माह से मूल निवासी पत्र बनाने के लिए ई-मित्र व तहसील दफ्तर के चक्कर लगाने को मजबूर है। लेकिन अभी तक भी उसका मूल निवासी प्रमाण पत्र नही बन पाया है।
हादसे में गंवा बैठा अपना एक पैर
बरसों पहले गिट्टी क्रेशर में मजदूरी करने के दोरान एक हादसे में अपना एक पैर गवां बैठा कालूलाल सहरिया निकटवर्ती नारेड़ा गांव से ट्राइसाइकिल पर अपनी पत्नी के साथ करीब दो माह में कई चक्कर मूल निवासी प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लगा चुका। लेकिन अभी तक भी उसका मूल निवासी प्रमाण पत्र नहीं बन पाया है।
स्कूटी के लिए जरूरी
कालूलाल सहरिया ने बताया कि उसके पास ट्राइसाइकिल है। इससे ही कहीं आना-जाना पड़ता है। उसकी पत्नी उसकी साइकिल को धक्का लगाकर बारां तक लाती है। उसे स्कूटी लेने के लिए समाज कल्याण विभाग में आवेदन कर रखा है। लेकिन मूल निवासी प्रमाण पत्र के अभाव में उसे स्कूटी नहीं मिल पा रही है। शुक्रवार को भी कालूलाल सहरिया तथा उसकी पत्नी अनिता सहरिया मूल निवासी प्रमाण पत्र के लिए तहसील के दफ्तर में पहुंचे थे। इस दौरान कालूलाल की पत्नी को मिनी सचिवालय के बाहर इंतजार करते हुए ट्राई साइकिल पर ही नींद आ गई।
शाम को निराश होकर अपने गांव लौट गया कालूलाल
बाद में कालूलाल ने अपनी पीड़ा को बताते हुए कहा कि वह करीब दो माह से अस्पताल के सामने स्थित ई-मित्र कियोस्क तथा तहसील के दफ्तर के दो माह में पांच बार चक्कर काट चुका है। लेकिन यहां से वहां भिजवाया जा रहा है। शुक्रवार को भी उसका मूल निवासी प्रमाण पत्र नही बन पाया। जिसके चलते उसे निराश होकर वापस गांव लौटना पड़ा।
मूल निवासी तीन या चार दिन में निश्चित बनाकर दे दिया जाता है। कालूलाल के मामले में क्या परेशानी है, मेरी जानकारी में नही है। मामले को दिखाकर शीघ्र ही समाधान करवाया जाएगा।
दशरथ, तहसीलदार, बारां