शिक्षा के नाम पर शहर में खुला खेल जारी है और इसकी सीधी मार अभिभावकों की जेब पर पड़ रही है। निजी स्कूलों ने न सिर्फ फीस में मनमानी बढ़ोतरी कर दी है, बल्कि ड्रेस और किताबों के नाम पर भी मोटा कमीशन खेल चल रहा है।
बरेली। शिक्षा के नाम पर शहर में खुला खेल जारी है और इसकी सीधी मार अभिभावकों की जेब पर पड़ रही है। निजी स्कूलों ने न सिर्फ फीस में मनमानी बढ़ोतरी कर दी है, बल्कि ड्रेस और किताबों के नाम पर भी मोटा कमीशन खेल चल रहा है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बना हुआ है, जबकि निजी स्कूलों के संगठन पूरे सिस्टम पर भारी पड़ते दिख रहे हैं।
नए सत्र में स्कूल पहुंचते ही अभिभावकों से रजिस्ट्रेशन फॉर्म: 2,500 से 4,000 रुपये
एडमिशन फीस: 25 हजार से 90 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इसके बावजूद एडमिशन की कोई गारंटी नहीं है। यानी पैसा भी गया और अनिश्चितता भी बनी रही।
नियम कहता है कि स्कूल सालभर में 10 प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ा सकते, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। पीलीभीत रोड निवासी दिवाकर बताते हैं कि पिछले साल 19,500 रुपये (तीन माह) फीस थी, इस साल वही बढ़कर 21,650 रुपये हो गई। एडमिशन फीस 30 हजार से बढ़कर 35 हजार यानी मासिक फीस में 11 प्रतिशत और एडमिशन में 16 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है।
सबसे बड़ा खेल यहीं हो रहा है कि स्कूल हर साल ड्रेस बदल देते हैं, और किताबें भी केवल चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध होती हैं। अभिभावकों का आरोप है कि बाजार में सस्ती ड्रेस/किताबें नहीं खरीद सकते हैं। स्कूल द्वारा तय दुकानों से ही खरीदना मजबूरी है। पीछे से कमीशन का बड़ा खेल यानी शिक्षा के साथ-साथ अब स्कूल मार्केटिंग सिंडिकेट भी सक्रिय है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि फीस लेट होने पर बच्चों को प्रताड़ित किया जा रहा
दस्तावेज और बोर्ड एडमिट कार्ड तक रोके जा रहे। हाल ही में एक स्कूल ने 12वीं के छात्रों का भविष्य सिर्फ इसलिए रोक दिया क्योंकि फीस बकाया थी। इससे बच्चों में हीन भावना और मानसिक दबाव बढ़ रहा है।
शिक्षा विभाग का दावा है कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई होगी, लेकिन सवाल यह है कि
जब समस्या पूरे शहर की है तो शिकायत का इंतजार क्यों? जेडी राकेश कुमार का कहना है कि अभी तक कोई शिकायत नहीं आई, जबकि अभिभावक संघ खुलकर कह रहा है कि फीस बढ़ोतरी की जरूरत का आकलन तक नहीं हो रहा, समिति की बैठकें भी नहीं हो रहीं।
असल तस्वीर यह है कि निजी स्कूलों के संगठन इतने मजबूत हो चुके हैं कि प्रशासनिक सिस्टम भी दबाव में नजर आ रहा है। नतीजा अभिभावक हर साल फीस, ड्रेस, किताब और फॉर्म के नाम पर कटते जा रहे हैं, लेकिन राहत की कोई उम्मीद नहीं।