बाड़मेर के जालिपा गांव का 12 वर्षीय ओमप्रकाश जन्म के तीन दिन बाद से दुर्लभ त्वचा रोग एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा से जूझ रहा है। शरीर पर फफोले पड़ते हैं और रगड़ से चमड़ी फट जाती है। इलाज में परिवार की जमा पूंजी खर्च हो गई और आयुष्मान योजना का लाभ भी नहीं मिला।
बाड़मेर: हे भगवान, ये क्या जिंदगी दी है इस मासूम को। कल इसकी अंगुली गिर गई थी, आज अंगूठा चला गया। चमड़ी को हाथ लगाओ तो कागज की तरह फट जाती है। शरीर में जहां हाथ लगाओ वहां दर्द और कहीं पानी फूट पड़ता है तो कहीं लहू या मवाद।
जन्म के तीन दिन बाद से शुरू हुई यह पीड़ा बारह साल की उम्र तक चल रही है। बूढ़ा दादा अपने पोते को कंधे पर उठाए बाड़मेर के जालिपा से उस हर अस्पताल गया, जहां उम्मीद थी। अंधविश्वास पर भी विश्वास कर भोपा छोड़ा और न तांत्रिक। लेकिन दुआ और दवा दोनों अब तक कोई काम नहीं आई है। अब वह अपने पोते की इस हालत पर कराहते हुए कह रहा है, मेरे गोद से कोई भी इसे ले लो, बस बचा लो।
बेदर्द दर्द की बेइंतिहाई की यह कहानी जालिपा गांव के ओमप्रकाश की है। पुरखाराम ने घर पोते का जन्म हुआ तो खुशियां बंटी। थाली बजने के साथ घर के चारों ओर बधाइयां भी बंटी। तीन दिन की इन खुशियों के बाद इस मासूम सी जान के शरीर पर अचानक फोड़े उभरने शुरू हुए।
बदहवास से दादा ने बच्चे को गोद में उठाया और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा। यहां चिकित्सकों ने प्रारंभिक उपचार किया और कुछ दवाइयां दी, लेकिन उनकी समझ से बाहर मामला था। पुरखाराम को बाड़मेर से जोधपुर, जोधपुर से अहमदाबाद, मुंबई और पता नहीं कितने ही अस्पतालों में दौड़ना पड़ा। लेकिन हर जगह दवा जरूर मिली पर इलाज नहीं लगा, बीमारी बढ़ती गई।
बाहर जाने पर चिकित्सकों ने तीसरे दिन ही बता दिया कि इसको एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा नामक एक बीमारी है। इस बीमारी में फफोले होते हैं, जो शरीर में रगड़ लगते ही हो जाएंगे। इनको ठीक करने के लिए कुछ दवाइयां देते हैं, जो कभी ठीक करती है और कभी नहीं। शरीर की चमड़ी का स्वभाव ऐसा होने का नतीजा है कि अब तो जहां-जहां रगड़ लगती है, वहां से मवाद और लहू आने लगता है।
तीन दिन के ओमप्रकाश के शरीर की इस पीड़ा ने परिजनों की हालत यह कर दी कि वे उसको कपड़े पहनाने से लेकर तेज हवा चलते तक से बचाने की जुगत में भी रहते हैं। हर दिन उनकी सांसें अटकती रही, जब कोई हल्की गलती ने उसे नया दर्द दे दिया। अब तो आलम यह हो गया है कि आधे से ज्यादा शरीर अब इन फफोलों से सड़ने लगा है। अंगुलियां गिर गई हैं। हथेली ही बची है। हाथों और पैरों की अंगुलियां बीमारी की वजह से गिर चुकी हैं।
अपनी सारी जमा पूंजी दादा ने अपने पोते के इलाज पर खर्च कर दी। वो कहता है कि मैं मेरे परिवार के सदस्य की पीड़ा को दूर करने के लिए सब कुछ दांव पर लगा चुका हूं। वह बताते हैं कि किसी ने उन्हें जोधपुर के एक निजी अस्पताल जाने की सलाह दी तो वे वहां भी पहुंच गए।
अस्पताल में चिकित्सकों ने मासूम की हालत को देख मुफ्त में इलाज करने का दावा किया, लेकिन प्लास्टिक सर्जरी के नाम पर करीब 3 लाख से अधिक का बिल बना दिया। इतनी अधिक राशि परिवार वहन नहीं कर पाया तो उन्हें बिल चुकाने के लिए और कर्जा लेना पड़ गया।
पीड़ित मासूम का केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत कार्ड भी बना हुआ है। लेकिन निजी अस्पताल में फ्री इलाज के बहाने बड़ा बिल वसूल लिया। इसकी शिकायत को लेकर मासूम के दादा पुरखाराम ने जिला कलक्टर से मुलाकात कर उन्हें राहत दिलाने की गुहार लगाई है।
इस बीमारी में फफोले शरीर पर होने लगते हैं। ये परिवार बच्चे को लेकर बड़ी संस्थाओं में भी पहुंचा है। इसका इलाज नहीं मिल पाया है। इसको मेडिकल की भाषा में एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा कहते हैं।
-डॉ. बीएल मंसूरिया, त्वचा रोग विशेषज्ञ