बालाजी मंदिर के पास पुरानी होली शहर की पुरानी होली
बाड़मेर.शहर के बालाजी मंदिर के पास शहर की सबसे प ुरानी होली है। यहां होलिका दहन और बच्चों की ढूंढ के लिए बड़ी संख्या में शहरभर से लोग पहुंचते है। इस होली के दर्शन को भी शाम को भीड़ जुटती है।
सनावड़ा की गैर- होली के दूसरे दिन धुलंडी को 20 किमी दूर सनावड़ा गांव में गैर का रंग जमेगा। पीढि़यों से आंगी-बांगी के साथ ढोल की धमक औैर थाली की खनक के साथ जमने वाली इस गैर को देखने को बीस हजार से अधिक लोग जुटते है। एेसा रंग जमता है कि दोपहर बाद होने वाले इस आयोजन को देर रात तक एकटक लोग निहारते नजर आते है।
शहर में सजेंगे ईलोजी- बालोतरा और बाड़मेर शहर के बीचो-बीच ईलोजी की प्रतिमाएं है। ईलोजी को होली के देवता माना जाता है। होली पर ईलोजी को रंगा जाएगा और इससे पूर्व इनकी धुलंडी के दिन विशेष पूजा भी होगी। ईलोजी के आगे फाग गाकर गेरिए मस्त होंगे।
यहां बनती है लकड़ी की तलवारें- बाड़मेर जिले के रामसर, शिव , गडऱारोड़ इलाके में परंपरा के मुताबिक लकड़ी की तलवारें बनाई जाती है। इनको होलिका दहन के समय होली में फेेंका जाता है और जब आधी जल जाती है तो फिर निकालकर उछालने का रिवाज है।
समदड़ी में होगी घांचा गोठ- समदड़ी कस्बे में घांचा गोठ का रिवाज है। यहां पर होलिका दहन के बाद सभी लोग अपना-अपना आटा लाकर इसमें बाटे बनाएंगे और सामुहिक दाल बनेगी। दालबाटी के अनोखे आयोजन को कई सालों से परंपरा के रूप में श्रीमाली समाज के आेर से निभाया जा रहा है।
बालोतरा में निकलेगी फाग गेर- बालोतरा में फाग के साथ गेर का आयोजन अपने आप में अलग है। इसमें होली की गालियों के साथ गलियों में भजन गाते हुए चलते गेरियों को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती है और दिन में ही बच्चों की ढूंढ में शामिल होकर ये पूरी मस्ती में रहते है।
मेलों की शुरुआत होलिका से ही- मालाणी पट्टी में शीतला सप्तमी तक मेले लगेंगे और यहां होली को भी शीतला सप्तमी तक का त्यौहार माना जाता है। इन मेलों में पहुंचकर शीतलामाता का पूजन करने के साथ गैर खेलने का पूरा आनंद लिया जाता है।