
खुद प्यासा रह जाता है, हजारों की प्यास का आसरा
सोनिया चैनल का हो उद्धार
नम्बर गेम
-100 बेरियां है चैनल में
- 70 बेरियां हो चुकी जर्जर
- 30 में पानी, मरम्मत की दरकार
- 11 साल से इनके निर्माण पर नहीं खर्च हुई राशि
रामसर पत्रिका.
सरकार जहां बारिश की एक-एक बूंद पानी को बचाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। वहां बारिश के पानी को बचाकर हजारों लोगों की प्यास बुझाने के लिए बनाए गए सोनिया चैनल के खुद प्यासा रहने की नौबत आ गई है। सर्दियों में ही इस चैनल को सुधारकर तैयार किया जाए तो आने वाली बारिश में यह हजारों मवेशियों और लोगों की प्यास बुझा सकता है।
सोनिया चैनल रामसर गांव में है। रामसर के आसपास के करीब 65 गांव यहां से जुड़े हैं। अकाल में भी इन बेरियों में पानी रहता है। इस पानी को लाने के लिए लोग अपने साधन से पहुंचते हैं। सुबह चार से दस बजे तक बेरियों से पानी ले जाते हैं। सरकारी पेयजल आपूर्ति का आलम यह है कि अधिकांश गांव पेयजल योजनाओं से जुड़े नहीं है और जिनको जोड़ा है वहां महीनों तक पानी नहीं आता है। एेसे में इन गांवों के लिए सोनिया चैनल की बेरियां ही आसरा है। बारिश में तालाब लबालब भरा हो तो बाद में सालभर तक बेरियों का पानी खत्म नहीं होता है। इसके लिए ही पहाड़ से चैनल बनाया गया है , लेकिन यहां चैनल की दुर्दशा और बेरियां ढह जाने के बाद अब लोगों को यहां पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है। 100 में से 70 से अधिक बेरियां जवाब दे चुकी है। 30 बेरियां भी जर्जर हाल में है।
मवेशियों के लिए बड़ा सहारा
रामसर तहसील के आसपास गाय, बकरी, भेड़ और ऊंट की संख्या बहुतायत में है। पशुपालकों को खुद से ज्यादा चिंता पशुओं की है। बेरियों के इस पानी के भरोसे ही अकाल में पशुधन को जिंदा रख पाते हैं, लेकिन पशुधन के लिए बेरियों के पानी के जवाब देने पर पशुधन काल का ग्रास की नौबत आ रही है।