
राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले के हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक, कमलेश प्रजापत एनकाउंटर प्रकरण में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ सामने आया है। दरअसल, जोधपुर महानगर सेशन कोर्ट ने इस पूरे विवाद पर एक विस्तृत सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट के पुराने आदेश को पलट दिया है। कोर्ट के इस नए फैसले से आईपीएस अधिकारी आनंद शर्मा सहित 24 पुलिसकर्मियों के ऊपर लगे कथित फर्जी एनकाउंटर और हत्या के गंभीर आरोप पूरी तरह से खारिज हो गए हैं। अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर यह स्पष्ट किया है कि कमलेश प्रजापत की मौत कोई सुनियोजित मर्डर या फर्जी मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि पुलिस टीम द्वारा वास्तविक और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अपनी जान बचाने के लिए की गई आत्मरक्षा की कार्रवाई थी। इस फैसले के आने के बाद पिछले 5 वर्षों से मानसिक और कानूनी तनाव झेल रहे राजस्थान पुलिस के अधिकारियों और जवानों ने बड़ी राहत की सांस ली है।
इस पूरे मामले की जड़ें 22 अप्रैल 2021 की उस रात से जुड़ी हैं, जब बाड़मेर के सदर थाना क्षेत्र में स्थित कमलेश प्रजापत के आवास पर पुलिस की एक विशेष टीम दबिश देने पहुंची थी। पुलिस के पास इनपुट थे कि कमलेश प्रजापत अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियों में लिप्त है।
पुलिस की थ्योरी के अनुसार, जैसे ही पुलिस कमांडोज ने कमलेश के घर को घेरा, उसने आत्मसमर्पण करने के बजाय भागने का प्रयास किया। कमलेश ने अपनी एक्सयूवी (XUV) गाड़ी को स्टार्ट किया और तेज रफ्तार में अपने ही घर का मुख्य लोहे का गेट तोड़ते हुए बाहर निकलने की कोशिश की। इस दौरान उसने वहां तैनात पुलिसकर्मियों और कमांडोज के ऊपर सीधे गाड़ी चढ़ाने का प्रयास किया, जिससे कई जवानों की जान बाल-बाल बची।
इसी जानलेवा हमले और खुद की रक्षा करने के उद्देश्य से मौके पर तैनात पुलिस कमांडोज ने गाड़ी के टायरों और चालक की सीट की तरफ गोलियां चलाईं। इस फायरिंग में कमलेश प्रजापत को गोलियां लगीं और अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना के तुरंत बाद जब पुलिस ने कमलेश के घर और परिसर की सघन तलाशी ली, तो वहां से भारी मात्रा में नकद कैश, कई लग्जरी गाड़ियाँ, भारी मात्रा में अफीम का दूध और अवैध हथियार बरामद किए गए थे, जिसने कमलेश के बड़े आपराधिक नेटवर्क की पुष्टि की थी।
एनकाउंटर की खबर जैसे ही बाड़मेर और आसपास के जिलों में फैली, कमलेश के परिजनों और स्थानीय प्रजापत समाज ने पुलिस के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे एक सोची-समझी राजनीतिक हत्या करार दिया था। परिवार का आरोप था कि यह पूरा एनकाउंटर वास्तविक नहीं बल्कि फर्जी था।
परिजनों ने आरोप लगाया था कि बाड़मेर के पचपदरा में चल रहे रिफाइनरी प्रोजेक्ट के करोड़ों रुपए के ठेकों और व्यावसायिक वर्चस्व को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के राजस्व व कैबिनेट मंत्री हरीश चौधरी के भाई और कमलेश प्रजापत के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। परिजनों के अनुसार, इसी रंजिश के चलते राजनीतिक दबाव में पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग करके कमलेश को रास्ते से हटाने के लिए यह फर्जी एनकाउंटर रचा गया था। इस मांग को लेकर मारवाड़ में बड़े पैमाने पर धरने-प्रदर्शन और रैलियां आयोजित की गईं, जिससे तत्कालीन सरकार बैकफुट पर आ गई थी।
इस मामले ने उस समय एक बहुत बड़ा सियासी रूप ले लिया जब प्रजापत समाज और विपक्ष के भारी दबाव के बीच मई 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी ही सरकार के कद्दावर कैबिनेट मंत्री हरीश चौधरी के खिलाफ जाते हुए इस पूरे एनकाउंटर की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने के आदेश दे दिए।
गहलोत सरकार के इस कदम के बाद बाड़मेर और बालोतरा क्षेत्र के कई कांग्रेसी विधायक जो हरीश चौधरी के समर्थक माने जाते थे, वे एकजुट होकर मुख्यमंत्री से मिलने जयपुर पहुंचे थे। राजनीतिक गलियारों और सार्वजनिक मंचों पर इस एनकाउंटर को लेकर हरीश चौधरी को जमकर टारगेट किया गया, जिससे कांग्रेस पार्टी के भीतर की आंतरिक गुटबाजी भी खुलकर सामने आ गई थी।
मामले की कमान संभालने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की टीम ने बाड़मेर में हफ्तों तक डेरा डाला, क्राइम सीन का री-क्रिएशन किया, बैलिस्टिक एक्सपर्ट्स की मदद ली और दर्जनों गवाहों के बयान दर्ज किए। लंबी जांच के बाद सीबीआई इस निष्कर्ष पर पहुंची कि पुलिस का दावा सही था और कमलेश की मौत आत्मरक्षा में चलाई गई गोली से हुई थी। सीबीआई ने कोर्ट में अपनी फाइनल क्लोजर रिपोर्ट (FR) पेश कर दी, जिसमें पुलिसकर्मियों और पूर्व मंत्री हरीश चौधरी को क्लीन चिट दी गई थी।
कहानी में एक नया मोड़ अप्रैल 2025 में आया। कमलेश की पत्नी जसोदा की ओर से कोर्ट में एक प्रोटेस्ट पिटीशन (Protest Petition) दायर की गई थी। इस पिटीशन पर सुनवाई करते हुए जोधपुर की एसीजेएम सीबीआई कोर्ट (ACJM CBI Court) ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को नामंजूर कर दिया। निचली अदालत ने तत्कालीन बाड़मेर एसपी आनंद शर्मा और पाली एसपी कालूराम रावत सहित 24 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या (धारा 302) का मामला दर्ज करने का एक बेहद सख्त आदेश सुनाया था। साथ ही, पूर्व मंत्री हरीश चौधरी और उनके भाई की भूमिका की दोबारा गहनता से जांच करने के आदेश दिए गए थे, जिसके बाद सीबीआई की टीम दोबारा सबूत जुटाने बाड़मेर पहुंची थी।
एसीजेएम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ पुलिस अधिकारियों और सीबीआई ने जोधपुर महानगर सेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस ताजा कानूनी अपडेट के अनुसार, सेशन कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पूरी तरह त्रुटिपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया है।
सेशन कोर्ट ने सभी गवाहों, सबूतों और परिस्थितियों का दोबारा मूल्यांकन करने के बाद यह स्पष्ट किया कि ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर किसी की हत्या नहीं की थी। जब एक अपराधी तेज रफ्तार गाड़ी से पुलिसकर्मियों को कुचलने का प्रयास कर रहा हो, तो कानूनन पुलिस को अपनी और अपने साथियों की जान बचाने के लिए बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार है। इस ऐतिहासिक फैसले से आईपीएस आनंद शर्मा और उनके साथ शामिल 24 अन्य जांबाज पुलिसकर्मियों के दामन पर लगा कथित फर्जी एनकाउंटर का दाग पूरी तरह साफ हो गया है और उनके करियर व प्रतिष्ठा पर आया संकट हमेशा के लिए टल गया है।
कमलेश प्रजापत एनकाउंटर मामले के समय से ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश चौधरी राजनीतिक रूप से चौतरफा घिरे हुए थे। विपक्ष के साथ-साथ उनकी ही पार्टी के कई स्थानीय नेता उन पर लगातार सियासी हमले बोल रहे थे। इस पूरे घटनाक्रम और विवाद को लेकर जब भी मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर हरीश चौधरी से तीखे सवाल पूछे जाते थे, तो वह हमेशा बेहद सधे हुए अंदाज में एक ही बात कहते थे कि— "यह सवाल जिंदा रहना चाहिए।"
हरीश चौधरी का यह बयान इस बात का संकेत था कि वह जांच और न्यायिक प्रक्रिया का सामना करने के लिए तैयार हैं और समय आने पर सच सबके सामने आ जाएगा। अब जब जोधपुर की सबसे बड़ी सेशन अदालत ने इस एनकाउंटर को पूरी तरह वास्तविक ठहराते हुए क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, तो हरीश चौधरी के विरोधियों के पास अब कोई कानूनी आधार नहीं बचा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले के बाद हरीश चौधरी मारवाड़ की राजनीति में एक बार फिर से पूरी ताकत के साथ उभरेंगे और अपने विरोधियों को इस मुद्दे पर करारा जवाब देंगे।