बाड़मेर

संरक्षण का अभाव, दम तोड़ रहा जूती उद्योग

अधिक लागत-कम मुनाफा, कामगरों का मोहभंग हो रहा

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समदड़ी में एक दुकान पर बिकने को सजी मोजड़ी

समदड़ी ञ्च पत्रिका.
सरकारी संरक्षण के अभाव में पैरों की शान माने जाने वाली पगरखी मोजड़ी दम तोड़ रही है। मोजड़ी के महंगे होने पर अब इसे लोग शौक के रूप में ही पहनते हैं। इससे

अब इसके बनाने वाले कारीगरों के हाथों से रोजगार छिनते जा रहे हैं।

पैरों के रखवाले के नाम से जानी जाने वाली चमड़े की पगरखी मोजड़ी अब लुप्त होने लगी है । गांवों में पूर्व में हर घर में पुरूष व महिलाएं पैरों में चमड़े की मौजड़ी पहनती थी। लेकिन आधुनिकता के दौर में अब गिने चुने घरों में ही मोजड़ी देखने को मिलती है । तीज त्यौहार व शादी के मौके पर ही लोग मोजड़ी को खरीदते हैं। वहीं कई लोग महज शौक के रूप में इससे पहनते हैं। इससे मोजड़ी के प्रति ग्रामीणों का लगाव कम होता जा रहा है । इससे इसकी बिक्री कम होने से कामगार अब अन्य धन्धा करने को विवश है ।

मचके लाडा थारी मोजड़ी- विवाह गीतों में ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी दूल्हे दूल्हन को शादी के समय यह मोजड़ी पहनाई जाती है । मचके लाड़ा थारी मोजड़ी ढलके केशरिया री जोन गीत गाए जाते हैं । जालोर के बाद समदड़ी में तैयार मोजडिय़ों की मांग अधिक रहती है। अक्षय तृतीया पर सर्वाधिक विवाह होने पर इसकी अच्छी बिक्री होती है। समदड़ी में करीब एक सौ घर जीनगर समाज के हंै, इसमें से अधिकतर परिवार पारम्परिक मोजड़ी बनाते हैं। परिवार में पुरूष पगरखी तैयार करते व महिलाएं कशीदा निकालती है। इससे मौजड़ी निखर उठती है।
कानपुरी चमड़ा - चमड़े की मोजड़ी बेहद टिकाऊपन होती है, जो अधिकतर किसान परिवार के लोग पहनते हैं । कृषि सम्बधी कार्य करते हैं । पैरों के लिए इसे सुरक्षा कवच माना जाता है। इस पर इसे पगरखी नाम से जाना जाता है। इसके निर्माण का चमड़ा, कानपुर, चैन्नई और भीनमाल से आता है।। चमड़ा महंगा होने से इसकी लागत अधिक आती है। तैयार मोजड़ी बाजार में पांच सौ से एक हजार रुपए तक में बिकती है। महंगे भाव बिकने पर इसे बहुत कम लोग खरीदते हैं। इससे कामगरों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

नि.स.
महंगाई दिनों दिन बढ़ रही है । कड़ी मेहनत करने पर दिन में एक पगरखी तैयार होती है। मुश्किल से डेढ़ सौ दो सौ रुपए की मजदूरी होती है। इससे घर चलाना मुश्किल हो गया है। सरकार उद्योग को प्रोत्साहन दें।

- जसराज जीनगर कामगार
हमारे पास हाथों का हुनर है । लागत अधिक व कीमत कम आने से इस धन्धे के प्रति मोह भंग हो रहा है। सरकारी संरक्षण आवश्यक है।

सुरेश जीनगर

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Published on:
22 Apr 2018 06:06 pm
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