- सीमावर्ती जिले के सरकारी विद्यालयों में बालकों से ज्यादा बालिकाएं - लिंगानुपात व महिला शिक्षा में पुरुषों से कम, पांचवीं बोर्ड में उनसे ज्यादा
दिलीप दवे
बाड़मेर
सीमांत जिले की शिक्षा में अब सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। बाड़मेर जिले में कभी गांव में इक्की-दुक्की बालिका ही स्कूल जाती थी, वहां अब प्राथमिक शिक्षा अधिगम स्तर मूल्यांकन (पांचवीं बोर्ड) में प्रारम्भिक शिक्षा के तहत बालकों से अधिक बालिकाएं परीक्षा दे रही हैं। यह परीक्षा उनका इम्तिहान ही नहीं, बाड़मेर की नई सोच का परिणाम भी है।
प्रदेश के पिछड़े जिलों में शुमार बाड़मेर ने बालिका शिक्षा को लेकर नई शुरुआत का संकेत दिया है। यह गांव-गांव और गली-गली तक बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ अभियान के साथ बालिकाओं को समानता का दर्जा देने का संदेश भी दे रहा है। अब बालिकाएं भी बालकों के साथ पढ़-लिख कर न केवल आगे बढ़ रही हैं वरन् बालकों से भी संख्यात्मक दृष्टि से आगे निकल गई हैं। जिले में वर्तमान में पांचवीं बोर्ड के तहत राजकीय प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 32 हजार 496 परीक्षार्थी पंजीकृत हैं, जिसमें से बालिकाएं 16 हजार 374 हैं। एेसे में इनकी तादाद आधे से अधिक है। संस्कृत शिक्षा में भी यही स्थिति है। यहां 328 परीक्षार्थियों में से 184 बालिकाएं हैं।
अन्य में भी लगभग समान
- माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों व मदरसों में भी लगभग समान बालक-बालिकाएं पढ़ रहे हैं। जिले के मदरसों में 846 बालक अध्ययनरत हैं तो बालिकाएं 829 हैं। वहीं माध्यमिक में 5845 के मुकाबले बालिकाएं 5018 हैं।
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निजी में फर्क ज्यादा
सरकारी विद्यालयों में बालक-बालिकाएं लगभग समान हैं तो दूसरी ओर निजी विद्यालयों में दोनों में बीच काफी बड़ा अंतर है। निजी विद्यालयों में बालकों की तादाद 11 हजार 03 हैं। जबकि बालिकाएं इनसे आधी करीब 5 हजार 460 ही पढ़ रही हैं।
सुखद शुरुआत, आगे भी फायदा- बालिका शिक्षा को लेकर प्रारम्भिक विद्यालयों में यह शुरुआत सुखद लग रही है। इसका परिणाम आठवीं, दसवीं, बारहवीं के साथ स्नातक और स्नातकोत्तर में भी नजर आने लगा है। यहां भी पिछले कुछ सालों में बालिकाओं का नामांकन बढ़ा है।
फैक्ट फाइल
प्राथमिक, उच्च प्राथमिक विद्यालय
बालक बालिकाएं
16122 16374
संस्कृत शिक्षा
144 184
मदरसा विद्यालय
846 829
माध्यमिक, उच्च माध्यमिक
5845 5018
निजी विद्यालय
11003 5460
कुल 33960 27865सा