
बाड़मेर। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे कैसे हालातों में शिक्षा ग्रहण करते हैं, इसका उदाहरण बाड़मेर मुख्यालय से मात्र 15 किमी दूर सांगनसेरी गांव के राजकीय प्राथमिक स्कूल में देखा जा सकता है। पहले यह प्राथमिक स्कूल पेड़ के नीचे लगती थी। बरसात में छुट्टी हो जाती थी। अब यहां एक झोंपा बना दिया गया है।
पांच कक्षाएं इसके नीचे बैठती है। यह पथरीली जमीन का इलाका है। इन दिनों तापमान 42 डिग्री पार कर गया है। दोपहर में तो लू के थपेड़े और पत्थर तपने से यहां खड़े रहना भी मुश्किल। मासूम यहां इस छप्पर में बैठते है।
झोंपे में धूप आती है तो क्लास के बच्चे दूसरी तरफ हो जाते हैं। सभी कक्षाएं एक साथ लगती है। सर्दी में तो फिर भी बच्चे यहां पढ़ लेते हैं, लेकिन भीषण गर्मी मासूम बच्चों के लिए किसी कहर से कम नहीं है। स्कूल में मिलने वाले पोषाहार के वक्त पथरीली जमीन पर बच्चे बैठते हैं। इस स्थिति में बच्चों को पोषाहार खाते देखकर कोई भी विचलित हो सकता है। यह दृश्य शिक्षा के लिए किए जाने वाले बड़े-बड़े दावों पर प्रश्नचिह्न लगता है।
वोट दीजिए ये हालात बदलने के लिए....
मासूम बच्चाें काे जब सुबह 10 बजे पोषाहर दिया जाता है तो उनकाे खुले में आना पड़ता है, जहां उड़ती धूल सब्जी-रोटी में खाना मजबूरी है। ग्रामीण कई बार विधायक-सांसद और विभाग को बता चुके बावजूद एक 5 लाख बजट का स्कूल का कमरा नहीं मिला। ऐसे हालात अन्य कई जगहों पर है। जरूरी है इसके लिए वोट करें और सही आदमी चुनें जो इन मासूमों की सुने।
फोटो- ओम माली