जिला परिषद की बैठकों में उठने वाले मुद्दों पर विभाग बेपरवाह, जनप्रतिनिधि लापरवाह, कैसे हो समाधान
दिलीप दवे बाड़मेर.
जिला परिषद की हर बैठक एक जुमला अब आम हो गया है, सरकारी विभाग सदन के आदेशों की परवाह नहीं करते। इनके खिलाफ सदन में रोष है, सात दिन में कार्रवाई होनी चाहिए, निंदा प्रस्ताव पारित किया जाए। इस बात को सुनते-सुनते बाड़मेर की जनता के चार साल निकल गए,लेकिन न तो विभाग सुधरे ना ही कोई कार्रवाई हुई। हुआ तो बस इतना की हंगामा, आरोप-प्रत्यारोप,लंच और टी ब्रेक। स्थिति यह है कि जो मुद्दा एक बैठक उठा वो दूसरी और तीसरी तक चला, इसके बाद जनप्रतिनिधि भी बात को भूल गए और अधिकारियों ने तो जवाब देने की जेहमत ही नहीं उठाई।
सीमावर्ती जिले बाड़मेर के गांव-ढाणी की समस्याओं को जिले पर एक मंच प्रदान करने का कार्य जिला परिषद की साधारण बैठक करती है। इस बैठक में पूरे जिले से जिला परिषद सदस्य, प्रधान, विधायक, मंत्री के साथ कलक्टर, एसपी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहते हैं। एेसे में जनता को भी हर तीन-चार माह बाद होने वाली इस बैठक का इंतजार रहता है, लेकिन इस बैठक को लेकर कितनी गंभीरता बरती जा रही है, इसका उदाहरण इस बात से मिल जाता है कि बैठक में प्राय: सरकारी विभागों की उदासीनता को लेकर डेढ़-दो घंटे चर्चा होती है। पूरा सदन कहता है कि उनकी बात को विभागीय अधिकारी हल्के में लेते हैं, जिसके चलते जनसमस्याओं का समाधान महिनों व सालों तक नहीं होता। बावजूद इसके अभी तक ढर्रा नहीं सुधरा है। इतना ही नहीं जो जनप्रतिनिधि एक बैठक में मुद्दा उठाते हैं, वे दूसरी बैठक में हंगामा करते हैं और तीसरी बैठक में वे ही भूल जाते हैं। एेसे में जनता की समस्याएं जस की तस ही है। हर बैठक का खर्चा लाखों में- जिला परिषद की बैठक महज औपचारिकता भर नहीं है। इस पर लाखों रुपए खर्च होते हैं। हर विभाग का अधिकारी बाड़मेर आता है तो वाहनों का ईंधन, उनका दैनिक भत्ता भी बनता है। अमूमन एक बैठक में चालीस-पचास अधिकारी शामिल होते हैं। वहीं जनप्रतिनिधियों को भी भत्ता देय होता है। बैठक के दौरान चाय-खाने की व्यवस्था होती है। साथ ही बैठक के दौरान विद्युत खर्च, जनप्रतिनिधियों को देय स्टेशनरी आदि का भी व्यय इस बैठक में शामिल होता है। गौरतलब है कि पंचायतराज के चुनाव जनवरी 2015 में हुए थे।
कई विभाग तो प्रतिनिधि ही नहीं भेजते- जिला परिषद की बैठक को लेकर स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है कि कई विभाग तो इसमें प्रतिनिधि भी नहीं भेजते। एेसे में सदन में मुद्दा उठता है तो जवाब देने वाला भी कोई नहीं होता।
विधायक भी नहीं गंभीर-जिलापरिषद की बैठक को लेकर उदासीनता का आलम यह है कि बाड़मेर के सात विधायक होने के बावजूद अब तक की बैठक में एक बार को छोड़ दिया जाए तो कभी भी ये एक साथ उपस्थित नहीं हुए। हालांकि एक-दो विधायक एेसे हैं जो हर बैठक में आ रहे हैं।
बार-बार उठाते मुद्दे, हल नहीं- यह बात सही है कि जिला परिषद की बैठकों में जनप्रतिनिधि जनता की आवाज बन कर मुद़्दे बार-बार उठाते हैं, लेकिन अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं देते। एेसे में कई महत्वपूर्ण मुद्दे अभी तक हल नहीं हो पाए हैं।- फतेहखां, जिला परिषद सदस्य एवं कांग्रेस जिलाध्यक्ष
कार्रवाई का भय नहीं- जिला परिषद महत्वपूर्ण सदन है। बावजूद इसके सरकारी विभाग इसे गंभीरता से नहीं लेते। बार-बार कार्रवाई की मांग उठती है, लेकिन होती नहीं। एेसे में अधिकारी जिला परिषद में उठने वाले अधिकांश मुद्दों का जवाब तक नहीं देते। कार्रवाई का भय नहीं होने से यह स्थिति है।-रूपसिंह राठौड़, जिला परिषद सदस्य
यह है उदाहरण
साधारण बैठक 25 मई 2016 विभागीय जवाब
पंचायत समिति गडरारोड में इंदिरा गांधी नहर का निर्माण डीएनपी के चलते नहीं पालना अप्राप्त
साधारण बैठक 13 जनवरी 2017 विभागीय जवाब
पंचायत समिति गडरारोड में इंदिरा गांधी नहर का निर्माण डीएनपी के चलते नहीं पालना अप्राप्त
साधारण बैठक 21 जून 2017 विभागीय जवाब
बैठक से मुद्दा ही गायब जवाब मिला ही नहीं
बैठकवार ब्यौरा
25 मई 2016
मुद्दे उठे अप्राप्त पालना रिपोर्ट
51 10
13 जनवरी 2017
मुद्दे उठे अप्राप्त पालना रिपोर्ट
54 20
13 जनवरी 2017
मुद्दे उठे अप्राप्त पालना रिपोर्ट
51 12
21 जून 2017
मुद्दे उठे अप्राप्त पालना रिपोर्ट
54 20