बाड़मेर

विश्व मृदा दिवस विशेष : माटी हो रही बीमार, घट रहा उत्पादन

- उत्पादन क्षमता घट कर एक तिहाई हुई, जैविक खेती अपनाने की जरूरत, रासायनिक खाद के अधिक उपयोग से बढ़ा खतरा  

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Dec 05, 2017
World Soil Day Special in Barmer

बाड़मेर. बाढ़ाणा की माटी भी अब बीमार होने लगी है। भले ही यह अचरज लगे, लेकिन यह कड़वा सच अब सामने आ रहा है। अभी ऐसी स्थिति है कि जागरूकता बढ़ाई जाए तो इसमें सुधार किया जा सकता है। किसान जागरूक होकर जैविक खेती को अपनाएं और रासायनिक खाद का ज्यादा उपयोग नहीं करें तो यह बीमारी ठीक हो सकती है। वर्तमान में स्थिति यह है कि कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व कम हो रहे हैं। वैज्ञानिकों की सलाह है कि किसानों को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

सीमावर्ती जिला बाड़मेर 28,387 वर्ग किमी में फैला हुआ है, जिसमें से करीब 16 लाख हेक्टेयर में खेती होती है। इसमें से भी 2.़5 लाख हेक्टेयर में सिंचित खेती हो रही है। रबी की बुवाई के नाम से जानी जाने वाली सिंचित खेती ने भले ही किसानों की किस्मत बदल दी है, लेकिन बाढ़ाणा की माटी को बीमार भी कर दिया है। यह बीमारी उत्पादन क्षमता घटने पर सामने आ रही है। कृषि वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित है कि समय रहते इलाज नहीं किया तो फिर यह बीमारी लाइलाज न हो जाए।

एक तिहाई जमीन असिंचित, 32 फीसदी अकृषि योग्य
- जिले को क्षमता के आधार पर आठ भागों में बांटा गया है। इसमें प्रथम भाग एेसा होता है, जिसकी उर्वरक क्षमत सबसे ज्यादा होती है, जिले में यह जमीन नहीं है। द्वितीय व तृतीय भाग, जो सिंचित योग्य है, वह कुल भू भाग का करीब 21 फीसदी ही है। सबसे ज्यादा 48 फीसदी से अधिक जमीन असिंचित है, जो बारिश पर निर्भर है। जिले में पथरीली, लवणीय व अकृषि योग्य जमीन भी करीब 32 फीसदी है।

यह है पोषक तत्व की स्थिति
- जिले की मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति भी चिंताजनक है। प्रमुख तेरह पोषक तत्वों में से यहां की मृदा में नौ ही है। ये तत्व भी जितना होना चाहिए, उतनी मात्रा में नहीं हैं। जिसका असर फसल पर पड़ता है और प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

खाद का उपयोग सही मात्रा में नहीं
- विशेषज्ञों के अनुसार हमारी जमीन की उर्वरक क्षमता अन्य क्षेत्रों के मुकाबले कम ही है। एेसे में अब किसान बिना वैज्ञानिक सलाह के यूरिया, डीएपी सहित कई रासायनिक खाद का उपयोग कर उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं। इसका सही मात्रा में उपयोग नहीं करने से जमीन बीमार हो रही है। उनके अनुसार जैविक खेती से फायदा मिल सकता है, वहीं कृषि उपयोग के दौरान जमीन को साल-दो साल में एक बार बिना बोये रखना पड़ता है, लेकिन जिले में एेसा नहीं हो रहा। एेसे में प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम हो रहा है।

प्रभाव तो पड़ रहा है
- रासायनिक खाद का अधिक उपयोग यहां की जमीन के उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। बतौर उदाहरण जहां ज्यादा रासायनिक खाद का उपयोग हो रहा है, वहां जीरे का उत्पादन प्रति हेक्टेयर छह से घटकर चार क्ंिवटल तक आ गया है। यहीं स्थिति इसबगोल, तारामीरा, सरसों, मूंगफली सहित अन्य फसलों में भी देखने को मिल रही है। हालांकि स्थिति अभी तक चिंताजनक नहीं कह सकते, लेकिन सोचनीय स्थिति जरूर बन गई है।- डॉ.प्रदीप पगारिया, कृषि वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केन्द्र दांता

Published on:
05 Dec 2017 12:29 pm
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