Bastar Royal Tradition: परंपरा, आस्था और शाही वैभव का अनूठा संगम माड़पाल की ऐतिहासिक राजशाही होली में एक बार फिर देखने को मिलेगा। 600 साल से अधिक पुरानी इस परंपरा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।
600 Year Old Holi: परंपरा, आस्था और शाही वैभव का अनूठा संगम माड़पाल की ऐतिहासिक राजशाही होली में एक बार फिर देखने को मिलेगा। 600 साल से अधिक पुरानी इस परंपरा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। गांव में उत्सव जैसा माहौल है और रथ निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।
राजशाही होली की शुरुआत राजपरिवार द्वारा मावली माता की विशेष पूजा-अर्चना से होती है। इसके बाद रथारोहण की परंपरा निभाई जाती है। यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है, जहां राजपरिवार और ग्रामीण मिलकर इस उत्सव को भव्य रूप देते हैं।
इस वर्ष 13 मार्च की रात होलिका दहन होगा। परंपरा के अनुसार होलिका दहन में सात प्रकार की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है, जिनका धार्मिक महत्व माना जाता है। इस बार तेंदू की लकड़ी माचकोट जंगल से लाई जाएगी। लकड़ी लाने की प्रक्रिया भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूरी की जाती है।
माड़पाल की राजशाही होली में रथ परंपरा का विशेष महत्व है। यह आयोजन बस्तर दशहरे की तर्ज पर रथ निकालने की परंपरा से जुड़ा है। विशाल रथ का निर्माण पारंपरिक कारीगरों द्वारा किया जा रहा है। ग्रामीण श्रमदान कर इस कार्य में सहयोग दे रहे हैं।
इस उत्सव का संबंध बस्तर के इतिहास और राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ी लोककथाओं से बताया जाता है। मान्यता है कि उनके काल में इस राजशाही होली की शुरुआत हुई थी, जो आज भी उसी श्रद्धा और रीति-नीति से निभाई जाती है।
माड़पाल की यह होली केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस आयोजन में शामिल होते हैं। ग्रामीणों की आस्था इस उत्सव से गहराई से जुड़ी है, और पूरे क्षेत्र में इसे विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है। माड़पाल की राजशाही होली बस्तर की अनूठी पहचान बन चुकी है, जहां परंपरा और इतिहास आज भी जीवंत रूप में नजर आते हैं।