#Indravati Tiger Reserve#Indravati Tiger Reserve#Indravati Tiger Reserve#Indravati Tiger Reserve: 33 बरस में 34 से बचे सिर्फ 10 बाघ

बस्तर में बाघों का घर कहलाने वाले इंद्रावती टाइगर रिजर्व अब इनके लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं रह गया है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद से यहां बाघों की संख्या लगातार घट रही है।

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Mar 06, 2016
Indravati Tiger Reserve
Tiger Reserve in bastar
जगदलपुर.
बस्तर में बाघों का घर कहलाने वाले इंद्रावती टाइगर रिजर्व अब इनके लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं रह गया है। 1983 में टाइगर रिजर्व बनने के बाद से यहां बाघों की संख्या लगातार घट रही है।


विभागीय दस्तावेज के मुताबिक 1984 की गणना में यहां 34 से अधिक बाघ थे। 2014 की गणना में यह संख्या घटकर 10 रह गई है। दरअसल, 33 साल पहले
को टाइगर रिजर्व का दर्जा तो दिया गया लेकिन कभी भी बाघों के संरक्षण के लिए कोई पुख्ता प्रयास नहीं किया गया। संरक्षण के नाम पर विभाग केवल इनकी गिनती तक ही सिमट कर रहा गया है।


अंदरूनी इलाकों में विभाग की दखल नहीं


टाइगर रिजर्व के 8 रेंज में सौ से अधिक बीटगार्ड व फॉरेस्ट गार्ड की तैनाती है लेकिन हकीकत यह है कि अंदरूनी इलाकों में कभी-कभार ही कोई नजर आता है। माओवादी दहशत के चलते कोर क्षेत्र में प्रवेश करने की हिमाकत आज भी कोई नहीं करता है।


बीते साल कैमरे में ट्रैप हुआ बाघ


गत वर्ष अप्रैल में वन विभाग के ट्रैप कैमरे में बाघ की तस्वीरें कैद हुई थी। इंद्रावती रिजर्व में बाघों के मौजूद होने का यह पुख्ता प्रमाण था। इससे पहले यहां से एकत्र किए गए स्कैड (मल) के आधार पर ही वन विभाग बाघों के मौजूद होने का दावा करता था।


नहीं हुआ कभी कोई शोध

टाइगर रिजर्व का यह इलाका पूरी तरह से माओवादियों के कब्जे में है। यहां के बाघों पर आज तक न कभी कोई शोध हुआ और न ही किसी ने इनके व्यवहार या फिर रहवास के बारे में जानने की कोशिश की। बाघों के संरक्षण के नाम पर केवल टाइगर रिजर्व का नाम दे दिया गया है।


बाघों के संरक्षण के नहीं हो रहे प्रयास

वाइल्ड लाइफ के सीसीएफ वी. रामा राव ने कहा कि देश के अन्य टाइगर रिजर्व में लगातार बाघों की मॉनिटरिंग होती है और उनके व्यवहार के साथ ही उनके पर्यावास में हुए बदलाव का भी लगातार ध्यान रखा जाता है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व में ऐसा करना संभव नहीं है।


माओवादी वजह से विभाग का कोई भी व्यक्ति जंगल के अंदर नहीं जाना चाहता। यहां जाना खतरे से खाली नहीं है। इस वजह से बाघों के संरक्षण के प्रयास उस तरह से नहीं हो रहे हैं जैसे होने चाहिए। विभाग ने मोबाइल के जरिए भोपालपटनम व कुटरू में चौकी बनाकर गश्ती की योजना बनाई है।
Published on:
06 Mar 2016 01:53 pm