बस्तर

डर से आज़ादी तक… बस्तर के 40 गांवों में पहली बार फहराया तिरंगा, चार दशक बाद लौटी आज़ादी

Republic Day Bastar: कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों से लेकर अबूझमाड़ के सघन जंगलों तक, जहां दशकों तक भय और लाल आतंक की छाया रही, वहां चार दशक बाद 40 गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया।
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Updated: 26 Jan 2026, 11:55 AM IST
बस्तर के 40 गांवों में पहली बार फहराया तिरंगा(photo-AI)
बस्तर के 40 गांवों में पहली बार फहराया तिरंगा(photo-AI)

Republic Day Bastar: छत्तीसगढ़ के गणतंत्र दिवस की सुबह बस्तर में इतिहास बनकर आई। कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों से लेकर अबूझमाड़ के सघन जंगलों तक, जहां दशकों तक भय और लाल आतंक की छाया रही, वहां चार दशक बाद 40 गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया। यह सिर्फ ध्वजारोहण नहीं, बल्कि डर से आज़ादी और संविधान में भरोसे की सार्वजनिक घोषणा थी।

Republic Day Bastar: कर्रेगुट्टा से अबूझमाड़ तक बदला मंजर

तेलंगाना सीमा पर स्थित कर्रेगुट्टा पहाड़ी, जो कभी माओवादियों का मजबूत बेस कैंप मानी जाती थी, इस साल चले लगभग एक महीने लंबे अभियान के बाद सुरक्षा बलों द्वारा मुक्त कराई गई। यहां स्थायी सुरक्षा कैंप स्थापित होने के साथ ही आसपास के गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया।

बस्तर का 95% इलाका माओवाद मुक्त

डबल इंजन सरकार के तहत माओवादी हिंसा के खिलाफ आक्रामक रणनीति के बाद बस्तर संभाग का करीब 95 प्रतिशत क्षेत्र माओवाद से मुक्त हो चुका है। यही कारण है कि इस बार गणतंत्र दिवस बस्तर के इतिहास में खास बन गया—जहां पहले 26 जनवरी को सन्नाटा रहता था, वहां आज राष्ट्रगान गूंजा।

“आज लगा हम भी पूरे नागरिक हैं”

बीजापुर जिले के पेद्दाकोरमा गांव के किसान सोमड़ू पोड़ियम कहते हैं, “जिंदगी में पहली बार अपने गांव में झंडा देखा है। आज दिल भारी है, लग रहा है हम भी इस देश के पूरे नागरिक हैं।” वहीं अबूझमाड़ के एड़जुम गांव के निवासी रामधेर माड़वी कहते हैं, “पहले 26 जनवरी मतलब खतरा, आज मतलब गर्व। बच्चों को बताया- यह हमारा झंडा है, हमारा संविधान है।”

जहां डर था, वहां लौटा भरोसा

बीते एक साल में 58 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए, जिनमें से 53 कैंपों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया। पिछले चार वर्षों में बस्तर संभाग में कुल 135 कैंप खुले। इससे न सिर्फ सुरक्षा बढ़ी, बल्कि ग्रामीणों में यह भरोसा लौटा कि शासन सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर मौजूद है।

चार दशक की लड़ाई का परिणाम

माओवाद के खिलाफ संघर्ष बस्तर के लिए लंबा, कठिन और पीड़ादायक रहा है। 2001 से दिसंबर 2025 तक चले इस अभियान में 3414 मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 1573 माओवादी ढेर किए गए। इस संघर्ष में देश की रक्षा करते हुए 1318 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसकी कीमत आज बस्तर में लौटती शांति और लोकतंत्र के रूप में दिखाई दे रही है।

1821 निर्दोष नागरिकों की मौत

झीरम घाटी से लेकर ताड़मेटला तक के जख्म आज भी बस्तर की स्मृति में दर्ज हैं। 2021 के टेकुलगुड़ेम हमले के बाद रणनीति बदली गई—सुरक्षा बल स्थायी रूप से कोर एरिया में उतरे और माओवाद की जड़ों पर सीधा प्रहार किया। वर्ष 2025 निर्णायक साबित हुआ।

तिरंगे के साथ नई शुरुआत

चार दशक बाद 40 गांवों में लहराया तिरंगा बस्तर के लिए नई शुरुआत का प्रतीक है—जहां अब डर की जगह भरोसा, सन्नाटे की जगह राष्ट्रगान और लाल आतंक की जगह संविधान की ताकत दिखाई दे रही है।

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26 Jan 2026, 11:55 AM IST
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