कभी देश की प्रमुख ऊन मंडियों में शामिल था ब्यावर ,अब देशी ऊन की मांग व आवक घटी
सुनिल जैन
ब्यावर. देश की प्रमुख ऊन मंडियों में शामिल रही ब्यावर मंडी में अब ऊन का कारोबार नाम मात्रका रह गया है। यहां ऊन की आवक में भी कमी आई है। इसका कारण बाजार में चाइना वूल नोइल्स का आना व देशी ऊन की मंाग व भाव का कम होना है। ऐसे में देशी ऊन बेचने सेे भेड़पालकों ने किनारा कर लिया है। जानकारों के मुताबिक करीब दस साल पहले मंडी में दो सौ से तीन सौ क्विंटल ऊन की आवक होती थी और यहां पर दो सौ से ढ़ाई सौ फर्मो का पंजीयन था। उस समय साठ से सत्तर रुपए किलो ऊन का भाव था। इसके बाद बाजार में चाइना की वूल नोइल्स आई और दिनों दिन देशी ऊन का कारोबार घटता गया।वर्तमान में यहां पर पचास से सौ क्विंटल ऊन की आवक हो रही है और तीस से पैतीस फर्म का पंजीयन है। साथ ही भाव भी बीस से पच्चीस रुपए किलो ही है। भाव कम होने व मांग नहीं होने के कारण आस पास के छोटे भैड पालक भी ऊन को बेचने के लिए नहीं आ रहे है। उनका कहना है कि उनकी मेहनत व किराया भाड़ा भी नहीं निकल पाता।ऐसे में देशी ऊन बेचने का कोई मतलब नहीं है। यही कारण है कि भैडपालकों
इनका कहना है...
चाइना वूल नोइल्स का भाव पैतीस रुपए किलो है और इसके बाजार में आने से देशी ऊन की डिमांड कम हो गई। ऐसे मेें भाव गिरे और आवक भी कम हो गई।अब भावों को देखते हुए भैड़पालक ऊन बेचने में ज्यादा रूचि नहीं दिखा रहे।
संजय बियाणी, ऊन व्यापारी ब्यावर
करीब एक दशक पहले मंडी में ऊन की भारी आवक होती थी। ऊन की आवक में पिछले सालों के मुकाबले काफी कमी हुई है। इससे मंडी की आय भी प्रभावित हुई है।
महेश शर्मा, सचिव, कृषि मंडी ब्यावर