बेतुल

एक माह तक रंगों की धूम: बैतूल में गोंड समाज की अनूठी होली

Betul Tribal Holi: नर्मदापुरम संभाग के बैतूल और ग्वाल टोली में मनाई जाने वाली होली की परंपरा अनोखी है...।

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Mar 05, 2026

Betul Tribal Holi: बैतूल जिले के आदिवासी अंचलों में गोंड कोयतुर समाज द्वारा मनाई जाने वाली होली अपनी अनूठी परंपराओं और प्रकृति से जुड़ाव के कारण विशेष पहचान रखती है। यहां होली केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि पूरे एक माह तक चलने वाला सामुदायिक धार्मिक उत्सव है, जिसे खंडराय गढ़ जतरा के नाम से भी जाना जाता है। अलग-अलग गांवों में अलग-अलग दिनों पर मेले लगते हैं, जो अधिकांश बाजार के दिन होते हैं।

ग्राम सरपंच और समिति मेले का दिन तय करती है। होली में दूर-दूर से रिश्तेदार भी शामिल होते हैं। शोधकर्ता राहुल कुमरे बताते हैं कि होली के इस पर्व की शुरुआत खंडराय पेन (मेघनाथ) की विशेष पूजा से होती है। एक सप्ताह पहले से देव स्थान को गेरू से पोतकर और चुने के गोल ठपकों से सजाया जाता है।

समाज की सुख-समृद्धि और रोगों से रक्षा की कामना के साथ विधिविधान से पूजा-अर्चना की जाती है। गोंड समुदाय की होली पूरी तरह प्राकृतिक रंगों पर आधारित होती है।

पलाश के फूल, जिन्हें टेंशू का फूल भी कहा जाता है, से रंग तैयार किए जाते हैं। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाती है।

नर्मदापुरम में ब्रज की तर्ज पर मनती है होली

नर्मदापुरम में होली का त्योहार जहां आमतौर पर रंग और उमंग के लिए जाना जाता है, वहीं ग्वालटोली में ग्वाल समाज इसे सामाजिक एकता और संवेदना के साथ मनाता है। पिछले करीब 50 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत समाज के लोग होली के दिन एकजुट होकर उन परिवारों के घर पहुंचते हैं, जहां किसी परिवार मे गमी हुई होती है। ब्रज की होली की तर्ज पर यहां होली मनाई जाती है।

समाज के चौधरी नंदू यादव ने बताया कि यह परंपरा बुजुर्गों के समय से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। होली की सुबह महिला-पुरुष, बुजुर्ग और युवा एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। इसके बाद फाग गीत गाते हुए, ढोलक और मंजीरे की थाप पर टोली के रूप में उन घरों की ओर जाते हैं, जहां हाल के समय में किसी परिवार ने अपने प्रियजन को खोया हो। वहां पहुंचकर परिवारजनों का हालचाल लिया जाता है और परंपरा के अनुसार हल्का रंग-गुलाल लगाकर उन्हें होली की शुभकामनाएं दी जाती हैं।

इस अवसर पर समाज की ओर से फवुआ (मीठी बूंदी) भी बांटी जाती है, जो परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है। रंग, फाग गीत और फवुआ के वितरण के साथ समाज एकजुटता का संदेश देता है कि दु:ख की घड़ी में पूरा समाज उनके साथ है।

Published on:
05 Mar 2026 07:00 am
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